डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर जी की जीवनी (Biography of Dr. Bhimrao Ambedkar) - Gyaan Booster - Free Online Education

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Thursday, August 17, 2017

डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर जी की जीवनी (Biography of Dr. Bhimrao Ambedkar)

Biography of Dr. Bhimrao Ambedkar (Baba Sahab)

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           डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर ( 14 अप्रैल, 1891 – 6 दिसंबर, 1956 ) विश्व स्तर के भारतीय विधिवेत्ता, राजनीतिज्ञ, समाज शास्त्री, मानवविज्ञानी, संविधानविद्, लेखक, दार्शनिक, इतिहासकार, धर्मशास्त्री, वकील, विचारक, शिक्षाविद, प्रोफ़ेसर, पत्रकार, बोधिसत्व, संपादक, क्रांतिकारी, समाज सुधारक, भाषाविद, जलशास्त्री, स्वतंत्रता सेनानी, बौद्ध धर्म के प्रवर्तक, सत्याग्रही, दलित-शोषित नागरिक अधिकारों के संघर्ष के प्रमुख नेता थे और वे भारतीय संविधान के शिल्पकार भी है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर भारत के सामाजिक आन्दोलन के सबसे बड़े नेता थे। डॉ. भीमराव आंबेडकर बाबासाहेब के नाम से लोकप्रिय हैं, जिसका मराठी भाषा में अर्थ 'पिता' होता है। उनके व्यक्तित्व में स्मरण शक्ति की प्रखरता, प्रचंड बुद्धिमत्ता, ईमानदारी, सच्चाई, साहस, नियमितता, दृढता, दूरदृष्टि, प्रचंड संग्रामी स्वभाव का मेल था। भारत को मजबूत लोकतंत्र प्रदान करने वाले बाबासाहेब अनन्य कोटी के नेता थे, जिन्होंने अपना समस्त जीवन समग्र भारत के कल्याण के लिए लगाया। भारत के शोषित, पिडीत, दलित एवं पिछडे सामाजिक व आर्थिक तौर से अभिशप्त थे, उन्हें इस अभिशाप से मुक्ति दिलाना ही डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी के जीवन का प्रमुख संकल्प था। इनके उत्थान के संघर्ष में वे हमेशा व्यस्त रहे और साथ ही भारतीय स्वतंत्र्यता, आधुनिक भारत के निर्माण में अनमोल योगदान एवं कार्य करते रहे। भारत देश के सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, शिक्षा, कानून, बिजली आदी क्षेत्रों में उनके अतुलनीय योगदान रहे है इसलिए डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को आधुनिक भारत के निर्माता भी कहां जाता है।[1][2][3][4] प्रकांड विद्वान एवं बहुश्रुत डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की 64 विषयों पर मास्टरी थी, जो कि केंब्रिज विश्वविद्यालय, इंग्लैंड के 2011 के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के इतिहास में सबसे ज्यादा है।[5][6] इसलिए इस विश्वविद्यालय ने बाबासाहेब को विश्व के सबसे प्रतिभाशाली इंसान घोषित किया है। अमेरिका के विश्वप्रसिद्ध कोलंबिया विश्वविद्यालय ने बाबासाहेब को विश्व के टॉप 100 महान विद्वानों की सूचीं में शीर्ष पर स्थान दिया है। विश्वविद्यालय इन 100 विद्वानों की सूची में बाबासाहेब ही एकमात्र भारतीय थे। भारत में हुए दि ग्रेटेस्ट इंडियन नामक विश्वस्तर के भारतीय सर्वेक्षण में भी बाबासाहेब टॉप 100 भारतीयों में पहले सबसे महानतम भारतीय या दि ग्रेटेस्ट इंडियन घोषित हूए है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ही भारत के अब तक के पहले सबसे महान अर्थशास्त्री है। विश्व एवं भारत के सबसे बुद्धिमान विद्वांनो में बाबासाहेब का नाम सबसे पहले लिया जाता है। भारत के सबसे महान समाज सुधारक, सबसे महान विधिवेत्ता के तौर पर भी बाबासाहेब ही नाम सबसे आगे है।

बाबासाहेब का जन्म एक गरीब परिवार मे हुआ था। एक अछूत परिवार में जन्म लेने के कारण उन्हें सारा जीवन नारकीय कष्टों में बिताना पड़ा। बाबासाहेब आंबेडकर ने अपना सारा जीवन हिंदू धर्म की चतुवर्ण प्रणाली और भारतीय समाज में सर्वव्यापित जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में बिता दिया। हिंदू धर्म में मानव समाज को चार वर्णों में वर्गीकृत किया है। जो इस प्रकार है- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। बाबासाहेब ने इस व्यवस्था को बदलने के लिए सारा जीवन कठीण संघर्ष किया है। इसलिए उन्होंने बौद्ध धर्म को ग्रहण करके इसके समतावादी विचारों से समाज में समानता स्थापित कराई। हालांकी वे बचपन से बुद्ध के अनुयायी थे। उन्हें दलित बौद्ध आंदोलन को प्रारंभ करने का श्रेय भी जाता है। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को महापरिनिर्वाण के 34 वर्ष बाद सन 1990 में भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया है, जो भारत का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है।
कई सामाजिक और वित्तीय बाधाएं पार कर, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर उन कुछ पहले अछूतों मे से एक बन गये जिन्होने भारत में कॉलेज की शिक्षा प्राप्त की। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने कानून की उपाधि प्राप्त करने के साथ ही विधि, अर्थशास्त्र व राजनीति विज्ञान में अपने अध्ययन और अनुसंधान के कारण कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स से कई डॉक्टरेट डिग्रियां भी अर्जित कीं। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर वापस अपने देश एक प्रसिद्ध विद्वान के रूप में लौट आए और इसके बाद कुछ साल तक उन्होंने वकालत का अभ्यास किया। इसके बाद उन्होंने कुछ पत्रिकाओं का प्रकाशन किया, जिनके द्वारा उन्होंने भारतीय अस्पृश्यों के राजनैतिक अधिकारों और सामाजिक स्वतंत्रता की वकालत की। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को वैश्विक बौद्ध संमेलन, नेपाल में बौद्ध भिक्षुओं ने बोधिसत्व की उपाधि प्रदान की है, हालांकि उन्होने खुद को कभी भी बोधिसत्व नहीं कहा, यही उनकी बडी महानता है। 'बोधिसत्व' बौद्ध धर्म की सर्वोच्च उपाधी है, खुद पर विजय प्राप्त कर बुद्धत्व के करीब पोहोचने वाले एवं बुद्ध बनने के रास्तें पर चलने वाले महाज्ञानी, महान मानवतावादी एवं सबका कल्याणकारी व्यक्ति 'बोधिसत्व' कहलाता है। बोधिसत्व अवस्था प्राप्त करने के कई अवस्थाओं गुजरना पडता है। बोधिसत्व उपाधी हिंदू या संस्कृत ग्रंथों की महात्मा उपाधी से बहूत व्यापक एवं उच्च दर्जे की है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को धम्म दिक्षा देने वाले महान बौद्ध भिक्षु महास्थवीर चंद्रमनी ने उन्हें को इस युग का भगवान बुद्ध कहाँ है।

प्रारंभिक जीवन

बाबासाहेब डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर जी का जन्म ब्रिटिशों द्वारा केन्द्रीय प्रांत (अब मध्य प्रदेश में) में स्थापित नगर व सैन्य छावनी महू में हुआ था।[7] वे रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई की १४ वीं व अंतिम संतान थे।[8] उनका परिवार मराठी था और वो अंबावडे नगर जो आधुनिक महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले मे है, से संबंधित था। वे हिंदू महार जाति से संबंध रखते थे, जो अछूत कहे जाते थे और उनके साथ सामाजिक और आर्थिक रूप से गहरा भेदभाव किया जाता था। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के पूर्वज लंबे समय तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में कार्यरत थे और उनके पिता, भारतीय सेना की मऊ छावनी में सेवा में थे और यहां काम करते हुये वो सूभेदार के पद तक पहुँचे थे। उन्होंने मराठी और अंग्रेजी में औपचारिक शिक्षा की डिग्री प्राप्त की थी। उन्होने अपने बच्चों को स्कूल में पढने और कड़ी मेहनत करने के लिये हमेशा प्रोत्साहित किया।
कबीर पंथ से संबंधित इस परिवार में, रामजी सकपाल, अपने बच्चों को हिंदू ग्रंथों को पढ़ने के लिए, विशेष रूप से महाभारत और रामायण प्रोत्साहित किया करते थे। हालांकी बाबासाहेब कभी भी राम, कृष्ण, द्रोण से प्रभावित नहीं हुए. वे बुद्ध शिक्षाओं ने प्रभावित किया, जब उन्होंने पहली बार बुद्ध चरित्र पढा। रामजी बाबा ने सेना में अपनी हैसियत का उपयोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूल से शिक्षा दिलाने मे किया, क्योंकि अपनी जाति के कारण उन्हें इसके लिये सामाजिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा था। स्कूली पढ़ाई में सक्षम होने के बावजूद डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और अन्य अस्पृश्य बच्चों को विद्यालय में अलग या बाहर बिठाया जाता था और अध्यापकों द्वारा न तो ध्यान ही दिया जाता था, न ही कोई सहायता दी जाती थी। उनको कक्षा के अन्दर बैठने की अनुमति नहीं थी, साथ ही प्यास लगने प‍र कोई ऊँची जाति का व्यक्ति ऊँचाई से पानी उनके हाथों पर पानी डालता था, क्योंकि उनको न तो पानी, न ही पानी के पात्र को स्पर्श करने की अनुमति थी। लोगों के मुताबिक ऐसा करने से पात्र और पानी दोनों अपवित्र हो जाते थे। आमतौर पर यह काम स्कूल के चपरासी द्वारा किया जाता था जिसकी अनुपस्थिति में बालक भीमराव आंबेडकर को बिना पानी के ही रहना पड़ता था। १८९४ मे रामजी सकपाल सेवानिवृत्त हो जाने के बाद सब परिवार सतारा चले गए और इसके दो साल बाद, बाबासाहेब की मां की मृत्यु हो गई। बच्चों की देखभाल उनकी बुआ मीराबाई ने कठिन परिस्थितियों में रहते हुये की। रामजी सकपाल के केवल तीन बेटे, बलराम, आनंदराव और भीमराव और दो बेटियाँ मंजुला और तुलसा ही इन कठिन हालातों मे जीवित बच पाये। अपने भाइयों और बहनों मे केवल बाबासाहेब ही स्कूल की परीक्षा में सबसे अधिक सफल हुए और इसके बाद बड़े विश्वविद्यालय जाने में सफल हुये। रामजी सकपाल ने सिकूल में अपने बेटे भीमराव का नाम ‘भीमराव रामजी सकपाल' की बजायं ‘भीमराव रामजी आंबावडेकर' लिखवाया, क्योंकी आंबावडेकर नाम उनमें मूल गांव ‘आंबावडे’ पर आधारित था। बाद में एक देशस्त ब्राह्मण शिक्षक महादेव आंबेडकर जो उनसे विशेष स्नेह रखते थे, ने उनके नाम से ‘आंबावडेकर’ हटाकर अपना सरल ‘आंबेडकर’ उपनाम जोड़ दिया। और आज आंबेडकर नाम संपूर्ण विश्व में अमर हो चूकाँ है।
रामजी सकपाल ने सन १८९८ मे पुनर्विवाह कर लिया और परिवार के साथ मुंबई (तब बंबई) चले आये। यहाँ डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर एल्फिंस्टोन रोड पर स्थित गवर्न्मेंट हाई स्कूल के पहले अछूत छात्र बने।[9] पढा़ई में अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन के बावजूद, छात्र भीमराव आंबेडकर लगातार अपने विरुद्ध हो रहे इस अलगाव और, भेदभाव से व्यथित रहे। सन १९०७ में मैट्रिक परीक्षा पास करने के बाद भीमराव आंबेडकर ने मुंबई विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और इस तरह वो भारतीय महाविद्यालय में प्रवेश लेने वाले पहले अस्पृश्य बन गये। मैट्रिक परिक्षा पास की उनकी इस बडी सफलता से उनके पूरे समाज मे एक खुशी की लहर दौड़ गयी, क्योंकि तब के समय में मैट्रिक परिक्षा पास होना बहूत बडी थी और अछूत का मैट्रिक परिक्षा पास होना तो आश्चर्यजनक एवं बहूत महत्त्वपूर्ण बडी बात थी।इसलिए मैट्रिक परिक्षा पास होने पर उनका एक सार्वजनिक समारोह में सम्मान किया गया इसी समारोह में उनके एक शिक्षक कृष्णजी अर्जुन केलूसकर ने उन्हें अपनी लिखी हुई पुस्तक गौतम बुद्ध की जीवनी भेंट की, श्री केलूसकर, एक मराठा जाति के विद्वान थे। इस बुद्ध चरित्र को पढकर पहिली बार बाबासाहेब बुद्ध की शिक्षाओं से ज्ञान होकर बुद्ध से बहूत प्रभावी हुए। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की सगाई एक साल पहले हिंदू रीति के अनुसार दापोली की, एक नौ वर्षीय लड़की, रमाबाई से तय की गयी थी।[9] सन १९०८ में, उन्होंने एलिफिंस्टोन कॉलेज में प्रवेश लिया और बड़ौदा के गायकवाड़ शासक सयाजीराव गायकवाड से संयुक्त राज्य अमेरिका मे उच्च अध्ययन के लिये एक पच्चीस रुपये प्रति माह का वजीफा़ प्राप्त किया। १९१२ में उन्होंने राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में अपनी बी.ए. की डिग्री प्राप्त की और बड़ौदा राज्य सरकार की नौकरी को तैयार हो गये। उनकी पत्नी रमाबाई ने अपने पहले बेटे यशवंत को इसी वर्ष १२-१२-१९१२ में जन्म दिया। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर अपने परिवार के साथ बड़ौदा चले आये पर जल्द ही उन्हें अपने पिता रामजी आंबेडकर की बीमारी के चलते मुंबई वापस लौटना पडा़, जिनकी मृत्यु २ फरवरी १९१३ को हो गयी।

उच्च शिक्षा

सन 1922 में एक वकील के रूप में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर
सन 1922 में एक वकील के रूप में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर
गायकवाड शासक ने सन १९१३ में संयुक्त राज्य अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय मे जाकर अध्ययन के लिये डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का चयन किया गया साथ ही इसके लिये एक ११.५ डॉलर प्रति मास की छात्रवृत्ति भी प्रदान की। न्यूयॉर्क शहर में आने के बाद, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को राजनीति विज्ञान विभाग के स्नातक अध्ययन कार्यक्रम में प्रवेश दे दिया गया। शयनशाला मे कुछ दिन रहने के बाद, वे भारतीय छात्रों द्वारा चलाये जा रहे एक आवास क्लब मे रहने चले गए और उन्होने अपने एक पारसी मित्र नवल भातेना के साथ एक कमरा ले लिया। १९१६ में, उन्हे उनके एक शोध के लिए पीएच.डी. से सम्मानित किया गया। इस शोध को अंततः उन्होंने पुस्तक "'इवोल्युशन ओफ प्रोविन्शिअल फिनान्स इन ब्रिटिश इंडिया'" के रूप में प्रकाशित किया। हालाँकि उनकी पहला प्रकाशित काम, एक लेख जिसका शीर्षक, भारत में जाति : उनकी प्रणाली, उत्पत्ति और विकास है। अपनी डाक्टरेट की डिग्री लेकर सन १९१६ में डॉ. आंबेडकर लंदन चले गये जहाँ उन्होने ग्रेज् इन और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में कानून का अध्ययन और अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट शोध की तैयारी के लिये अपना नाम लिखवा लिया। अगले वर्ष छात्रवृत्ति की समाप्ति के चलते मजबूरन उन्हें अपना अध्ययन अस्थायी तौर बीच मे ही छोड़ कर भारत वापस लौटना पडा़ ये प्रथम विश्व युद्ध का काल था। बड़ौदा राज्य के सेना सचिव के रूप में काम करते हुये अपने जीवन मे अचानक फिर से आये भेदभाव से डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर निराश हो गये और अपनी नौकरी छोड़ एक निजी ट्यूटर और लेखाकार के रूप में काम करने लगे। यहाँ तक कि अपनी परामर्श व्यवसाय भी आरंभ किया जो उनकी सामाजिक स्थिति के कारण विफल रहा। अपने एक अंग्रेज जानकार मुंबई के पूर्व राज्यपाल लॉर्ड सिडनेम, के कारण उन्हें मुंबई के सिडनेम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनोमिक्स मे राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्रोफेसर के रूप में नौकरी मिल गयी। १९२० में कोल्हापुर के महाराजा अपने पारसी मित्र के सहयोग और अपनी बचत के कारण वो एक बार फिर से इंग्लैंड वापस जाने में सक्षम हो गये। १९२३ में उन्होंने अपना शोध प्रोब्लेम्स ऑफ द रुपी (रुपये की समस्यायें) पूरा कर लिया। उन्हें लंदन विश्वविद्यालय द्वारा "डॉक्टर ऑफ साईंस" की उपाधि प्रदान की गयी। और उनकी कानून का अध्ययन पूरा होने के, साथ ही साथ उन्हें ब्रिटिश बार मे बैरिस्टर के रूप में प्रवेश मिल गया। भारत वापस लौटते हुये डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर तीन महीने जर्मनी में रुके, जहाँ उन्होने अपना अर्थशास्त्र का अध्ययन, बॉन विश्वविद्यालय में जारी रखा। उन्हें औपचारिक रूप से ८ जून १९२७ को कोलंबिया विश्वविद्यालय द्वारा पीएच.डी. प्रदान की गयी।

छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष

भारत सरकार अधिनियम १९१९, तैयार कर रही साउथबोरोह समिति के समक्ष, भारत के एक प्रमुख विद्वान के तौर पर अम्बेडकर को गवाही देने के लिये आमंत्रित किया गया। इस सुनवाई के दौरान, अम्बेडकर ने दलितों और अन्य धार्मिक समुदायों के लिये पृथक निर्वाचिका (separate electorates) और आरक्षण देने की वकालत की। १९२० में, बंबई में, उन्होंने साप्ताहिक मूकनायक के प्रकाशन की शुरूआत की। यह प्रकाशन जल्द ही पाठकों मे लोकप्रिय हो गया, तब्, अम्बेडकर ने इसका इस्तेमाल रूढ़िवादी हिंदू राजनेताओं व जातीय भेदभाव से लड़ने के प्रति भारतीय राजनैतिक समुदाय की अनिच्छा की आलोचना करने के लिये किया। उनके दलित वर्ग के एक सम्मेलन के दौरान दिये गये भाषण ने कोल्हापुर राज्य के स्थानीय शासक शाहू चतुर्थ को बहुत प्रभावित किया, जिनका अम्बेडकर के साथ भोजन करना रूढ़िवादी समाज मे हलचल मचा गया। अम्बेडकर ने अपनी वकालत अच्छी तरह जमा ली और बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना भी की जिसका उद्देश्य दलित वर्गों में शिक्षा का प्रसार और उनके सामाजिक आर्थिक उत्थान के लिये काम करना था। सन् १९२६ में, वो बंबई विधान परिषद के एक मनोनीत सदस्य बन गये। सन १९२७ में डॉ॰ अम्बेडकर ने छुआछूत के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन शुरू करने का फैसला किया। उन्होंने सार्वजनिक आंदोलनों और जुलूसों के द्वारा, पेयजल के सार्वजनिक संसाधन समाज के सभी लोगों के लिये खुलवाने के साथ ही उन्होनें अछूतों को भी हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाने के लिये भी संघर्ष किया। उन्होंने महड में अस्पृश्य समुदाय को भी शहर की पानी की मुख्य टंकी से पानी लेने का अधिकार दिलाने कि लिये सत्याग्रह चलाया।
१ जनवरी १९२७ को डॉ अम्बेडकर ने द्वितीय आंग्ल - मराठा युद्ध, की कोरेगाँव की लडा़ई के दौरान मारे गये भारतीय सैनिकों के सम्मान में कोरेगाँव विजय स्मारक मे एक समारोह आयोजित किया। यहाँ महार समुदाय से संबंधित सैनिकों के नाम संगमरमर के एक शिलालेख पर खुदवाये। १९२७ में, उन्होंने अपना दूसरी पत्रिका बहिष्कृत भारत शुरू की और उसके बाद रीक्रिश्टेन्ड जनता की। उन्हें बाँबे प्रेसीडेंसी समिति मे सभी यूरोपीय सदस्यों वाले साइमन कमीशन १९२८ में काम करने के लिए नियुक्त किया गया। इस आयोग के विरोध मे भारत भर में विरोध प्रदर्शन हुये और जबकि इसकी रिपोर्ट को ज्यादातर भारतीयों द्वारा नजरअंदाज कर दिया गया, डॉ अम्बेडकर ने अलग से भविष्य के संवैधानिक सुधारों के लिये सिफारिशों लिखीं।

पूना संधि

दूसरा गोलमेज सम्मेलन
अब तक डॉ अम्बेडकर आज तक की सबसे बडी़ अछूत राजनीतिक हस्ती बन चुके थे। उन्होंने मुख्यधारा के महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों की जाति व्यवस्था के उन्मूलन के प्रति उनकी कथित उदासीनता की कटु आलोचना की। डॉ. अम्बेडकर ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उसके नेता मोहनदास करमचंद गांधी की आलोचना की, उन्होने उन पर अस्पृश्य समुदाय को एक करुणा की वस्तु के रूप मे प्रस्तुत करने का आरोप लगाया। अम्बेडकर ब्रिटिश शासन की विफलताओं से भी असंतुष्ट थे, उन्होने अस्पृश्य समुदाय के लिये एक ऐसी अलग राजनैतिक पहचान की वकालत की जिसमे कांग्रेस और ब्रिटिश दोनों का ही कोई दखल ना हो। 8 अगस्त, 1930 को एक शोषित वर्ग के सम्मेलन के दौरान अम्बेडकर ने अपनी राजनीतिक दृष्टि को दुनिया के सामने रखा, जिसके अनुसार शोषित वर्ग की सुरक्षा उसके सरकार और कांग्रेस दोनों से स्वतंत्र होने मे है।
हमें अपना रास्ता स्वयँ बनाना होगा और स्वयँ ... राजनीतिक शक्ति शोषितो की समस्याओं का निवारण नहीं हो सकती, उनका उद्धार समाज मे उनका उचित स्थान पाने मे निहित है। उनको अपना रहने का बुरा तरीका बदलना होगा.... उनको शिक्षित होना चाहिए .... एक बड़ी आवश्यकता उनकी हीनता की भावना को झकझोरने और उनके अंदर उस दैवीय असंतोष की स्थापना करने की है जो सभी उँचाइयों का स्रोत है।[8]
इस भाषण में डॉ. अम्बेडकर ने कांग्रेस और गांधी द्वारा चलाये गये नमक सत्याग्रह की शुरूआत की आलोचना की। अम्बेडकर की आलोचनाओं और उनके राजनीतिक काम ने उसको रूढ़िवादी हिंदुओं के साथ ही कांग्रेस के कई नेताओं मे भी बहुत अलोकप्रिय बना दिया, यह वही नेता थे जो पहले छुआछूत की निंदा करते थे और इसके उन्मूलन के लिये जिन्होने देश भर में काम किया था। इसका मुख्य कारण था कि ये "उदार" राजनेता आमतौर पर अछूतों को पूर्ण समानता देने का मुद्दा पूरी तरह नहीं उठाते थे। डॉ. अम्बेडकर की अस्पृश्य समुदाय मे बढ़ती लोकप्रियता और जन समर्थन के चलते उनको 1931 मे लंदन में दूसरे गोलमेज सम्मेलन में, भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। यहाँ उनकी अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने के मुद्दे पर तीखी बहस हुई। धर्म और जाति के आधार पर पृथक निर्वाचिका देने के प्रबल विरोधी गांधी ने आशंका जताई, कि अछूतों को दी गयी पृथक निर्वाचिका, हिंदू समाज की भावी पीढी़ को हमेशा के लिये विभाजित कर देगी।
1932 मे जब ब्रिटिशों ने अम्बेडकर के साथ सहमति व्यक्त करते हुये अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने की घोषणा की,[10][11] तब गांधी ने इसके विरोध मे पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल में आमरण अनशन शुरु कर दिया। मोहनदास गांधी ने रूढ़िवादी हिंदू समाज से सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता को खत्म करने तथा, हिंदुओं की राजनीतिक और सामाजिक एकता की बात की। गांधी के अनशन को देश भर की जनता से घोर समर्थन मिला और रूढ़िवादी हिंदू नेताओं, कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं जैसे पवलंकर बालू और मदन मोहन मालवीय ने डॉ. अम्बेडकर और उनके समर्थकों के साथ यरवदा मे संयुक्त बैठकें कीं। अनशन के कारण गांधी की मृत्यु होने की स्थिति मे, होने वाले सामाजिक प्रतिशोध के कारण होने वाली अछूतों की हत्याओं के डर से और गाँधी जी के समर्थकों के भारी दवाब के चलते अंबेडकर ने अपनी पृथक निर्वाचिका की माँग वापस ले ली। इसके एवज मे अछूतों को सीटों के आरक्षण, मंदिरों में प्रवेश/पूजा के अधिकार एवं छूआ-छूत ख़तम करने की बात स्वीकार कर ली गयी। गाँधी ने इस उम्मीद पर की बाकि सभी स्वर्ण भी पूना संधि का आदर कर, सभी शर्ते मान लेंगे अपना अनशन समाप्त कर दिया।
आरक्षण प्रणाली में पहले दलित अपने लिए संभावित उम्मीदवारों में से चुनाव द्वारा (केवल दलित) चार संभावित उम्मीदवार चुनते। इन चार उम्मीदवारों में से फिर संयुक्त निर्वाचन चुनाव (सभी धर्म \ जाति) द्वारा एक नेता चुना जाता। इस आधार पर सिर्फ एक बार सन 1937 में चुनाव हुए। आंबेडकर 20-25 साल के लिये आरक्षण चाहते थे लेकिन गाँधी के अड़े रहने के कारण यह आरक्षण मात्र 5 साल के लिए ही लागू हुआ।
पृथक निर्वाचिका में दलित दो वोट देता एक सामान्य वर्ग के उम्मीदवार को ओर दूसरा दलित (पृथक) उम्मीदवार को। ऐसी स्थिति में दलितों द्वारा चुना गया दलित उम्मीदवार दलितों की समस्या को अच्छी तरह से तो रख सकता था किन्तु गैर उम्मीदवार के लिए यह जरूरी नहीं था कि उनकी समस्याओं के समाधान का प्रयास भी करता। बाद मे अम्बेडकर ने गाँधी जी की आलोचना करते हुये उनके इस अनशन को अछूतों को उनके राजनीतिक अधिकारों से वंचित करने और उन्हें उनकी माँग से पीछे हटने के लिये दवाब डालने के लिये गांधी द्वारा खेला गया एक नाटक करार दिया। उनके अनुसार असली महात्मा तो ज्योतीराव फुले थे।
आचार्य ओशो इस पूना संधी के बारे कहते है की, "….डॉ. अंबेडकर चाहते थे कि शूद्रों को, हरिजनों (दलितों) को अलग मताधिकार प्राप्त हो जाए। काश डॉ. अंबेडकर जीत गए होते तो जो बदतमीज़ी सारे देश में हो रही है वह नहीं होती…. लेकिन महात्मा गांधी ने उपवास कर दिया…. उन्होंने उपवास कर दिया कि मैं मर जाऊँगा, अनशन कर दूँगा…. उनका लंबा उपवास, उनका गिरता स्वास्थ्य, डॉ. अंबेडकर को आखिर झुक जाना पड़ा…. मत दे अलग मताधिकार। और इसको गाँधीवादी इतिहासकार लिखते हैं- अहिंसा की विजय…. अब यह हैरानी की बात है इसमें अहिंसक कौन है? डॉ. अंबेडकर अहिंसक है….. इसमें गाँधी हिंसक है। उन्होंने डॉ. अंबेडकर को मजबूर किया हिंसा की धमकी देकर कि मैं मर जाऊँगा…. एक आदमी तुम्हारी छाती पर छुरा रख देता है और कहता है जेब में जो कुछ हो- यह हिंसा। और एक आदमी अपनी छाती पर छुरा रख लेता है वह कहता है निकालो जो कुछ जेब में हो अन्यथा मैं मार लूँगा छुरा। तुम सोचने लगते हो कि दो रुपल्ली जेब में है, इसके पीछे इस आदमी का मरना। भला चंगा आदमी है, एक जीवन का खो जाना. तुमने दो रुपए निकाल कर दे दिए कि भइया, तू ले ले और जा…. इसमें कौन अहिंसक है? मैं कहता हूँ डॉ. अंबेडकर अहिंसक है, गांधी नहीं…..।"

राजनीतिक जीवन

13 अक्टूबर 1935, को येओला नासिक मे अम्बेडकर एक रैली को संबोधित करते हुए.
13 अक्टूबर 1935 को, अम्बेडकर को सरकारी लॉ कॉलेज का प्रधानचार्य नियुक्त किया गया और इस पद पर उन्होने दो वर्ष तक कार्य किया। इसके चलते अंबेडकर बंबई में बस गये, उन्होने यहाँ एक बडे़ घर का निर्माण कराया, जिसमे उनके निजी पुस्तकालय मे 50000 से अधिक पुस्तकें थीं।[12] इसी वर्ष उनकी पत्नी रमाबाई की एक लंबी बीमारी के बाद मृत्यु हो गई। रमाबाई अपनी मृत्यु से पहले तीर्थयात्रा के लिये पंढरपुर जाना चाहती थीं पर अंबेडकर ने उन्हे इसकी इजाज़त नहीं दी। अम्बेडकर ने कहा की उस हिन्दु तीर्थ मे जहाँ उनको अछूत माना जाता है, जाने का कोई औचित्य नहीं है इसके बजाय उन्होने उनके लिये एक नया पंढरपुर बनाने की बात कही। भले ही अस्पृश्यता के खिलाफ उनकी लडा़ई को भारत भर से समर्थन हासिल हो रहा था पर उन्होने अपना रवैया और अपने विचारों को रूढ़िवादी हिंदुओं के प्रति और कठोर कर लिया। उनकी रूढ़िवादी हिंदुओं की आलोचना का उत्तर बडी़ संख्या मे हिंदू कार्यकर्ताओं द्वारा की गयी उनकी आलोचना से मिला। 13 अक्टूबर को नासिक के निकट येओला मे एक सम्मेलन में बोलते हुए अम्बेडकर ने धर्म परिवर्तन करने की अपनी इच्छा प्रकट की। उन्होने अपने अनुयायियों से भी हिंदू धर्म छोड़ कोई और धर्म अपनाने का आह्वान किया।[12] उन्होने अपनी इस बात को भारत भर मे कई सार्वजनिक सभाओं मे दोहराया भी।
1936 में, अम्बेडकर ने स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना की, जो 1937 में केन्द्रीय विधान सभा चुनावों मे 15 सीटें जीती। उन्होंने अपनी पुस्तक जाति के विनाश भी इसी वर्ष प्रकाशित की जो उनके न्यूयॉर्क मे लिखे एक शोधपत्र पर आधारित थी। इस सफल और लोकप्रिय पुस्तक मे अम्बेडकर ने हिंदू धार्मिक नेताओं और जाति व्यवस्था की जोरदार आलोचना की। उन्होंने अस्पृश्य समुदाय के लोगों को गाँधी द्वारा रचित शब्द हरिजन पुकारने के कांग्रेस के फैसले की कडी़ निंदा की।[12] अम्बेडकर ने रक्षा सलाहकार समिति और वाइसराय की कार्यकारी परिषद के लिए श्रम मंत्री के रूप में सेवारत रहे।
1941 और 1945 के बीच में उन्होंने बड़ी संख्या में अत्यधिक विवादास्पद पुस्तकें और पर्चे प्रकाशित किये जिनमे ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ भी शामिल है, जिसमें उन्होने मुस्लिम लीग की मुसलमानों के लिए एक अलग देश पाकिस्तान की मांग की आलोचना की। वॉट काँग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स (काँग्रेस और गान्धी ने अछूतों के लिये क्या किया) के साथ, अम्बेडकर ने गांधी और कांग्रेस दोनो पर अपने हमलों को तीखा कर दिया उन्होने उन पर ढोंग करने का आरोप लगाया।[13] उन्होने अपनी पुस्तक ‘हू वर द शुद्राज़?’( शुद्र कौन थे?) के द्वारा हिंदू जाति व्यवस्था के पदानुक्रम में सबसे नीची जाति यानी शुद्रों के अस्तित्व मे आने की व्याख्या की. उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि किस तरह से अछूत, शुद्रों से अलग हैं। अम्बेडकर ने अपनी राजनीतिक पार्टी को अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन मे बदलते देखा, हालांकि 1946 में आयोजित भारत के संविधान सभा के लिए हुये चुनाव में इसने खराब प्रदर्शन किया। 1948 में हू वर द शुद्राज़? की उत्तरकथा द अनटचेबलस: ए थीसिस ऑन द ओरिजन ऑफ अनटचेबिलिटी (अस्पृश्य: अस्पृश्यता के मूल पर एक शोध) मे अम्बेडकर ने हिंदू धर्म को लताड़ा।
हिंदू सभ्यता .... जो मानवता को दास बनाने और उसका दमन करने की एक क्रूर युक्ति है और इसका उचित नाम बदनामी होगा। एक सभ्यता के बारे मे और क्या कहा जा सकता है जिसने लोगों के एक बहुत बड़े वर्ग को विकसित किया जिसे... एक मानव से हीन समझा गया और जिसका स्पर्श मात्र प्रदूषण फैलाने का पर्याप्त कारण है?
[13]
अम्बेडकर इस्लाम और दक्षिण एशिया में उसकी रीतियों के भी बड़े आलोचक थे। उन्होने भारत विभाजन का तो पक्ष लिया पर मुस्लिमो मे व्याप्त बाल विवाह की प्रथा और महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहार की घोर निंदा की। उन्होंने कहा,
बहुविवाह और रखैल रखने के दुष्परिणाम शब्दों में व्यक्त नहीं किये जा सकते जो विशेष रूप से एक मुस्लिम महिला के दुःख के स्रोत हैं। जाति व्यवस्था को ही लें, हर कोई कहता है कि इस्लाम गुलामी और जाति से मुक्त होना चाहिए, जबकि गुलामी अस्तित्व में है और इसे इस्लाम और इस्लामी देशों से समर्थन मिला है। इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं है जो इस अभिशाप के उन्मूलन का समर्थन करता हो। अगर गुलामी खत्म भी हो जाये पर फिर भी मुसलमानों के बीच जाति व्यवस्था रह जायेगी।[14]
उन्होंने लिखा कि मुस्लिम समाज मे तो हिंदू समाज से भी कही अधिक सामाजिक बुराइयां है और मुसलमान उन्हें " भाईचारे " जैसे नरम शब्दों के प्रयोग से छुपाते हैं। उन्होंने मुसलमानो द्वारा अर्ज़ल वर्गों के खिलाफ भेदभाव जिन्हें " निचले दर्जे का " माना जाता था के साथ ही मुस्लिम समाज में महिलाओं के उत्पीड़न की दमनकारी पर्दा प्रथा की भी आलोचना की। उन्होंने कहा हालाँकि पर्दा हिंदुओं मे भी होता है पर उसे धर्मिक मान्यता केवल मुसलमानों ने दी है। उन्होंने इस्लाम मे कट्टरता की आलोचना की जिसके कारण इस्लाम की नातियों का अक्षरक्ष अनुपालन की बद्धता के कारण समाज बहुत कट्टर हो गया है और उसे को बदलना बहुत मुश्किल हो गया है। उन्होंने आगे लिखा कि भारतीय मुसलमान अपने समाज का सुधार करने में विफल रहे हैं जबकि इसके विपरीत तुर्की जैसे देशों ने अपने आपको बहुत बदल लिया है।[14]
"सांप्रदायिकता" से पीड़ित हिंदुओं और मुसलमानों दोनों समूहों ने सामाजिक न्याय की माँग की उपेक्षा की है।[14]
हालांकि वे मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग की विभाजनकारी सांप्रदायिक रणनीति के घोर आलोचक थे पर उन्होने तर्क दिया कि हिंदुओं और मुसलमानों को पृथक कर देना चाहिए और पाकिस्तान का गठन हो जाना चाहिये क्योकि एक ही देश का नेतृत्व करने के लिए, जातीय राष्ट्रवाद के चलते देश के भीतर और अधिक हिंसा पनपेगी। उन्होंने हिंदू और मुसलमानों के सांप्रदायिक विभाजन के बारे में अपने विचार के पक्ष मे ऑटोमोन साम्राज्य और चेकोस्लोवाकिया के विघटन जैसी ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख किया।
उन्होंने पूछा कि क्या पाकिस्तान की स्थापना के लिये पर्याप्त कारण मौजूद थे? और सुझाव दिया कि हिंदू और मुसलमानों के बीच के मतभेद एक कम कठोर कदम से भी मिटाना संभव हो सकता था। उन्होंने लिखा है कि पाकिस्तान को अपने अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करना चाहिये। कनाडा जैसे देशों मे भी सांप्रदायिक मुद्दे हमेशा से रहे हैं पर आज भी अंग्रेज और फ्रांसीसी एक साथ रहते हैं, तो क्या हिंदु और मुसलमान भी साथ नहीं रह सकते। उन्होंने चेताया कि दो देश बनाने के समाधान का वास्तविक क्रियान्वयन अत्यंत कठिनाई भरा होगा। विशाल जनसंख्या के स्थानान्तरण के साथ सीमा विवाद की समस्या भी रहेगी। भारत की स्वतंत्रता के बाद होने वाली हिंसा को ध्यान मे रख कर यह भविष्यवाणी कितनी सही थी||

संविधान निर्माण

अपने विवादास्पद विचारों और गांधी व कांग्रेस की कटु आलोचना के बावजूद अम्बेडकर की प्रतिष्ठा एक अद्वितीय विद्वान और विधिवेत्ता की थी जिसके कारण जब, 15 अगस्त 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार अस्तित्व मे आई तो उसने अम्बेडकर को देश का पहले कानून मंत्री के रूप में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। 29 अगस्त 1947 को, अम्बेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना के लिए बनी संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। अम्बेडकर ने मसौदा तैयार करने के इस काम मे अपने सहयोगियों और समकालीन प्रेक्षकों की प्रशंसा अर्जित की। इस कार्य में अम्बेडकर का शुरुआती बौद्ध संघ रीतियों और अन्य बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन बहुत काम आया।
संघ रीति मे मतपत्र द्वारा मतदान, बहस के नियम, पूर्ववर्तिता और कार्यसूची के प्रयोग, समितियाँ और काम करने के लिए प्रस्ताव लाना शामिल है। संघ रीतियाँ स्वयं प्राचीन गणराज्यों जैसे शाक्य और लिच्छवि की शासन प्रणाली के निदर्श (मॉडल) पर आधारित थीं। अम्बेडकर ने हालांकि उनके संविधान को आकार देने के लिए पश्चिमी मॉडल इस्तेमाल किया है पर उसकी भावना भारतीय है।
अम्बेडकर द्वारा तैयार किया गया संविधान पाठ मे संवैधानिक गारंटी के साथ व्यक्तिगत नागरिकों को एक व्यापक श्रेणी की नागरिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा प्रदान की जिनमें, धार्मिक स्वतंत्रता, अस्पृश्यता का अंत और सभी प्रकार के भेदभावों को गैर कानूनी करार दिया गया। अम्बेडकर ने महिलाओं के लिए धरा370व्यापक आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की वकालत की और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए सिविल सेवाओं, स्कूलों और कॉलेजों की नौकरियों मे आरक्षण प्रणाली शुरू के लिए सभा का समर्थन भी हासिल किया, भारत के विधि निर्माताओं ने इस सकारात्मक कार्यवाही के द्वारा दलित वर्गों के लिए सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के उन्मूलन और उन्हे हर क्षेत्र मे अवसर प्रदान कराने की चेष्टा की जबकि मूल कल्पना मे पहले इस कदम को अस्थायी रूप से और आवश्यकता के आधार पर शामिल करने की बात कही गयी थी। 26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अपना लिया। अपने काम को पूरा करने के बाद, बोलते हुए, अम्बेडकर ने कहा :
मैं महसूस करता हूं कि संविधान, साध्य (काम करने लायक) है, यह लचीला है पर साथ ही यह इतना मज़बूत भी है कि देश को शांति और युद्ध दोनों के समय जोड़ कर रख सके। वास्तव में, मैं कह सकता हूँ कि अगर कभी कुछ गलत हुआ तो इसका कारण यह नही होगा कि हमारा संविधान खराब था बल्कि इसका उपयोग करने वाला मनुष्य अधम था।
1951 मे संसद में अपने हिन्दू कोड बिल के मसौदे को रोके जाने के बाद अम्बेडकर ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया इस मसौदे मे उत्तराधिकार, विवाह और अर्थव्यवस्था के कानूनों में लैंगिक समानता की मांग की गयी थी। हालांकि प्रधानमंत्री नेहरू, कैबिनेट और कई अन्य कांग्रेसी नेताओं ने इसका समर्थन किया पर संसद सदस्यों की एक बड़ी संख्या इसके खिलाफ़ थी। अम्बेडकर ने 1952 में लोक सभा का चुनाव एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप मे लड़ा पर हार गये। मार्च 1952 मे उन्हें संसद के ऊपरी सदन यानि राज्य सभा के लिए नियुक्त किया गया और इसके बाद उनकी मृत्यु तक वो इस सदन के सदस्य रहे।

बौद्ध धर्म में परिवर्तन

दीक्षाभूमि, नागपुर; जहां बाबासाहेब अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म में परिवर्तित हुए।

सन् 1950 के दशक में बाबा साहेब अम्बेडकर बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुए और बौद्ध भिक्षुओं व विद्वानों के एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए श्रीलंका (तब सीलोन) गये। पुणे के पास एक नया बौद्ध विहार को समर्पित करते हुए, डॉ. अम्बेडकर ने घोषणा की कि वे बौद्ध धर्म पर एक पुस्तक लिख रहे हैं और जैसे ही यह समाप्त होगी वो औपचारिक रूप से बौद्ध धर्म अपना लेंगे।[15] 1954 में अम्बेडकर ने म्यानमार का दो बार दौरा किया; दूसरी बार वो रंगून मे तीसरे विश्व बौद्ध फैलोशिप के सम्मेलन में भाग लेने के लिए गये। 1955 में उन्होने 'भारतीय बौद्ध महासभा' या 'बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया' की स्थापना की। उन्होंने अपने अंतिम महान ग्रंथ, 'द बुद्ध एंड हिज़ धम्म' को 1956 में पूरा किया। यह उनकी मृत्यु के पश्चात सन 1957 में प्रकाशित हुआ। 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने खुद और उनके समर्थकों के लिए एक औपचारिक सार्वजनिक समारोह का आयोजन किया। डॉ. अम्बेडकर ने श्रीलंका के एक महान बौद्ध भिक्षु महत्थवीर चंद्रमणी से पारंपरिक तरीके से त्रिरत्न ग्रहण और पंचशील को अपनाते हुये बौद्ध धर्म ग्रहण किया। इसके बाद उन्होने एक अनुमान के अनुसार पहले दिन लगभग 5,00,000 समर्थको को बौद्ध धर्म मे परिवर्तित किया।[15] नवयान लेकर अम्बेडकर और उनके समर्थकों ने विषमतावादी हिन्दू धर्म और हिन्दू दर्शन की स्पष्ट निंदा की और उसे त्याग दिया। बाबासाहेब ने दुसरे दिन 15 अक्टूबर को नागपूर में अपने 2,00,000 अनुयायीओं को बौद्ध धम्म की दीक्षा दी, फिर तिसरे दिन 16 अक्टूबर को बाबासाहेब चंद्रपुर गये और वहां भी उन्होंने 3,00,000 समर्थकों को बौद्ध धम्म की दीक्षा दी। इस तरह केवल तीन में बाबासाहेब ने 10 लाख से अधिक लोगों को बौद्ध धर्म में परिवर्तित किया। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का बौद्ध धर्म परिवर्तन किया। इस घटना से बौद्ध देशों में से अभिनंदन प्राप्त हुए। में इसके बाद वे नेपाल में चौथे विश्व बौद्ध सम्मेलन मे भाग लेने के लिए काठमांडू गये। उन्होंने अपनी अंतिम पांडुलिपि बुद्ध या कार्ल मार्क्स को 2 दिसंबर 1956 को पूरा किया।

डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने दीक्षाभूमि, नागपुर, भारत में ऐतिहासिक बौद्ध धर्मं में परिवर्तन के अवसर पर,14 अक्टूबर 1956 को अपने अनुयायियों के लिए 22 प्रतिज्ञाएँ निर्धारित कीं जो बौद्ध धर्म का एक सार या दर्शन है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा 10,00,000 लोगों का बौद्ध धर्म में रूपांतरण ऐतिहासिक था क्योंकि यह विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक रूपांतरण था। उन्होंने इन शपथों को निर्धारित किया ताकि हिंदू धर्म के बंधनों को पूरी तरह पृथक किया जा सके। बाबासाहेब की ये 22 प्रतिज्ञाएँ हिंदू मान्यताओं और पद्धतियों की जड़ों पर गहरा आघात करती हैं। ये एक सेतु के रूप में बौद्ध धर्मं की हिन्दू धर्म में व्याप्त भ्रम और विरोधाभासों से रक्षा करने में सहायक हो सकती हैं। इन प्रतिज्ञाओं से हिन्दू धर्म, जिसमें केवल हिंदुओं की ऊंची जातियों के संवर्धन के लिए मार्ग प्रशस्त किया गया, में व्याप्त अंधविश्वासों, व्यर्थ और अर्थहीन रस्मों, से धर्मान्तरित होते समय स्वतंत्र रहा जा सकता है। ये प्रतिज्ञाए बौद्ध धर्म का एक अंग है जिसमें पंचशील, मध्यममार्ग, अनिरीश्वरवाद, दस पारमिता, बुद्ध-धम्म-संघ ये त्रिरत्न, प्रज्ञा-शील-करूणा-समता आदी बौद्ध तत्व, मानवी मुल्य (मानवता) एवं विज्ञानवाद है।

22 प्रतिज्ञाएँँ

  1. मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई विश्वास नहीं करूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा।
  2. मैं राम और कृष्ण, जो भगवान के अवतार माने जाते हैं, में कोई आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा ।
  3. मैं गौरी, गणपति और हिन्दुओं के अन्य देवी-देवताओं में आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा।
  4. मैं भगवान के अवतार में विश्वास नहीं करता हूँ।
  5. मैं यह नहीं मानता और न कभी मानूंगा कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे. मैं इसे पागलपन और झूठा प्रचार-प्रसार मानता हूँ।
  6. मैं श्रद्धा (श्राद्ध) में भाग नहीं लूँगा और न ही पिंड-दान दूँगा।
  7. मैं बुद्ध के सिद्धांतों और उपदेशों का उल्लंघन करने वाले तरीके से कार्य नहीं करूँगा।
  8. मैं ब्राह्मणों द्वारा निष्पादित होने वाले किसी भी समारोह को स्वीकार नहीं करूँगा।
  9. मैं मनुष्य की समानता में विश्वास करता हूँ।
  10. मैं समानता स्थापित करने का प्रयास करूँगा।
  11. मैं बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग का अनुशरण करूँगा।
  12. मैं बुद्ध द्वारा निर्धारित परमितों का पालन करूँगा।
  13. मैं सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया और प्यार भरी दयालुता रखूँगा तथा उनकी रक्षा करूँगा।
  14. मैं चोरी नहीं करूँगा।
  15. मैं झूठ नहीं बोलूँगा।
  16. मैं कामुक पापों को नहीं करूँगा।
  17. मैं शराब, ड्रग्स जैसे मादक पदार्थों का सेवन नहीं करूँगा।
  18. मैं महान आष्टांगिक मार्ग के पालन का प्रयास करूँगा एवं सहानुभूति और प्यार भरी दयालुता का दैनिक जीवन में अभ्यास करूँगा।
  19. मैं हिन्दू धर्म का त्याग करता हूँ जो मानवता के लिए हानिकारक है और उन्नति और मानवता के विकास में बाधक है क्योंकि यह असमानता पर आधारित है, और स्व-धर्मं के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाता हूँ।
  20. मैं दृढ़ता के साथ यह विश्वास करता हूँ की बुद्ध का धम्म ही सच्चा धर्म है।
  21. मुझे विश्वास है कि मैं फिर से जन्म ले रहा हूँ (इस धर्म परिवर्तन के द्वारा)।
  22. मैं गंभीरता एवं दृढ़ता के साथ घोषित करता हूँ कि मैं इसके (धर्म परिवर्तन के) बाद अपने जीवन का बुद्ध के सिद्धांतों व शिक्षाओं एवं उनके धम्म के अनुसार मार्गदर्शन करूँगा।

महापरिनिर्वाण (मृत्यु)

पुणे संग्रहालय में बाबासाहेब आंबेडकर की प्रतिमा।
1948 से, अम्बेडकर मधुमेह से पीड़ित थे। जून से अक्टूबर 1954 तक वो बहुत बीमार रहे इस दौरान वो कमजोर होती दृष्टि से ग्रस्त थे। राजनीतिक मुद्दों से परेशान अम्बेडकर का स्वास्थ्य बद से बदतर होता चला गया और 1955 के दौरान किये गये लगातार काम ने उन्हें तोड़ कर रख दिया। अपनी अंतिम पांडुलिपि बुद्ध और उनके धम्म को पूरा करने के तीन दिन के बाद 6 दिसम्बर 1956 को अम्बेडकर का महापरिनिर्वाण नींद में दिल्ली में उनके घर मे हो गया। 7 दिसंबर को मुंबई में दादर चौपाटी समुद्र तट पर बौद्ध शैली मे अंतिम संस्कार किया गया जिसमें उनके लाखों समर्थकों, कार्यकर्ताओं और प्रशंसकों ने भाग लिया। उनके अंतिम संस्कार के समय उन्हें साक्षी रखकर उनके करीब 10,00,000 अनुयायीओं ने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी, ऐसा विश्व इतिहास में पहिली बार हुआ।
मृत्युपरांत अम्बेडकर के परिवार मे उनकी दूसरी पत्नी डॉ. सविता अम्बेडकर रह गयी थीं जो, जन्म से ब्राह्मण थीं पर उनके साथ ही वो भी धर्म परिवर्तित कर बौद्ध बन गयी थीं, तथा दलित बौद्ध आंदोलन में बाबासाहेब के बाद (बाबासाहेब के साथ) बौद्ध बनने वाली वह पहिली व्यक्ति थी। विवाह से पहले उनकी पत्नी का नाम डॉ. शारदा कबीर था। डॉ. सविता अम्बेडकर की एक बौद्ध के रूप में सन 2002 में मृत्यु हो गई, अम्बेडकर के पौत्र, प्रकाश यशवंत अम्बेडकर, भारिपा बहुजन महासंघ का नेतृत्व करते है और भारतीय संसद के दोनों सदनों मे के सदस्य रह चुके है।
कई अधूरे टंकलिपित और हस्तलिखित मसौदे अम्बेडकर के नोट और पत्रों में पाए गए हैं। इनमें वैटिंग फ़ोर ए वीसा जो संभवतः 1935-36 के बीच का आत्मकथानात्मक काम है और अनटचेबल, ऑर द चिल्ड्रन ऑफ इंडियाज़ घेट्टो जो 1951 की जनगणना से संबंधित है।
एक स्मारक अम्बेडकर के दिल्ली स्थित उनके घर 26 अलीपुर रोड में स्थापित किया गया है। अम्बेडकर जयंती पर सार्वजनिक अवकाश रखा जाता है। 1990 में उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया है। कई सार्वजनिक संस्थान का नाम उनके सम्मान में उनके नाम पर रखा गया है जैसे हैदराबाद, आंध्र प्रदेश का डॉ॰ अम्बेडकर मुक्त विश्वविद्यालय, बी आर अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय- मुजफ्फरपुर, डॉ॰ बाबासाहेब अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा नागपुर में है, जो पहले सोनेगांव हवाई अड्डे के नाम से जाना जाता था। अम्बेडकर का एक बड़ा आधिकारिक चित्र भारतीय संसद भवन में प्रदर्शित किया गया है।
मुंबई मे उनके स्मारक हर साल लगभग पंधरा लाख लोग उनकी वर्षगांठ (14 अप्रैल), पुण्यतिथि (6 दिसम्बर) और धम्मचक्र परिवर्तन् दिन (14 अक्टूबर) नागपुर में, उन्हे अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए इकट्ठे होते हैं। सैकड़ों पुस्तकालय स्थापित हो गये हैं और लाखों रुपए की पुस्तकें बेची जाती हैं। अपने अनुयायियों को उनका महान संदेश था !' शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।

आंबेडकर के सिद्धान्त (आंबेडकरवाद)

स्वातंत्र्य

समानता

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी को ‘समानता का प्रतिक’ कहाँ जाता है। बाबासाहेब ने अपने पुरे जीवन काल में देश के शोषित, पिडीत, महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक क्षेत्र में समानता देने की बात कही है। बाबासाहेब की वजह से ही आज सबको समान अधिकार है।

भाईचारा

बौद्ध धर्म

विज्ञानवाद

मानवतावाद

सत्य

अहिंसा

भारतीय जीवन पर आंबेडकर बनाम गांधी

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उग्र आलोचक थे। उनके कई समकालीनों और कुछ आधुनिक विद्वानों ने उनके महात्मा गांधी (जो कि पहले भारतीय नेता थे जिन्होने अस्पृश्यता और भेदभाव करने का मुद्दा सबसे पहले उठाया था) के विरोध की आलोचना है, तो कई आधुनिक विद्वान डॉ. आंबेडकर, उनके विचार, कार्य और आंदोलन को सही मानकर उन्हें गांधी से बडे और महानतम् महापुरूष मानते है।
गांधी का दर्शन भारत के पारंपरिक ग्रामीण जीवन के प्रति अधिक सकारात्मक, लेकिन रूमानी था और उनका दृष्टिकोण अस्पृश्यों के प्रति भावनात्मक था उन्होने उन्हें महज हरिजन कह कर पुकारा। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने इस विशेषण को सिरे से अस्वीकार कर दिया। उन्होंने अपने अनुयायियों को गांव छोड़ कर शहर जाकर बसने और शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया। बाबासाहेब का दर्शन भारत के हर शोषित गरीब एवं दलित व्यक्ति ने स्विकार करके उनके बाताए हुए रास्ते पर चलकर सफलता पाई।

आधुनिक भारत के निर्माता – डॉ. अंबेडकर

बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर का भारत के विकास में जितना योगदान रहा है, उतना शायद ही किसी और राजनेता का रहा हो। एक अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, शिक्षाविद् और कानून के जानकार के तौर पर अंबेडकर ने आधुनिक भारत की नींव रखी थी और देश उनके इस योगदान को लेकर आज भी जागरूक नहीं है।
- डॉ. अंबेडकर संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे। उन पर आधुनिक भारत का संविधान बनाने की जिम्मेदारी थी और उन्होंने एक ऐसे संविधान की रचना की जिसकी नज़रों में सभी नागरिक एक समान हों, धर्मनिरपेक्ष हो और जिस पर देश के सभी नागरिक विश्वास करें। एक तरह से भीमराव अंबेडकर ने आज़ाद भारत के DNA की रचना की थी।
- इसके अलावा डॉक्टर अंबेडकर की प्रेरणा से ही भारत के Finance Commission यानी वित्त आयोग की स्थापना हुई थी।
- डॉ. अंबेडकर के Ideas से ही भारत के केन्द्रीय बैंक की स्थापना हुई, जिसे आज हम Reserve Bank of India के नाम से जानते हैं।
- दामोदर घाटी परियोजना, हीराकुंड परियोजना और सोन नदी परियोजना को स्थापित करने में डॉ. अंबेडकर ने बड़ी भूमिका निभाई थी।
- भारत में Employment Exchanges की स्थापना भी डॉक्टर अंबेडकर के विचारों की वजह से हुई थी।
- भारत में पानी और बिजली के Grid System की स्थापना में भी डॉक्टर अंबेडकर का अहम योगदान माना जाता है।
- भारत को एक स्वतंत्र चुनाव आयोग भी डॉ. भीमराव अंबेडकर की ही देन है।
ये वो योगदान है जिन्हें आज़ादी के बाद की तमाम सरकारों ने हमेशा ही अनदेखा किया है। यानी योजनाएं और विचार अंबेडकर के थे, लेकिन उनका श्रेय दूसरे लोगों ने लूटा।

भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के बीच चले राजनीतिक शीत युद्ध यानी Political Cold War के कुछ उदाहरण ...
-डॉ. अंबेडकर, जवाहर लाल नेहरू की सरकार में प्लानिंग का मंत्रालय चाहते थे लेकिन नेहरू ने अंबेडकर को सिर्फ कानून मंत्रालय दिया।
-डॉ. अंबेडकर विदेश और रक्षा मामलों की समितियों में सदस्यता चाहते थे, लेकिन नेहरू सरकार ने डॉ. अंबेडकर को ऐसी किसी समिति का सदस्य नहीं बनाया।
- डॉ. अंबेडकर, नेहरू सरकार की विदेश नीति से असहमत थे।
- डॉ. अंबेडकर हिंदुओं में सामाजिक अधिकार और महिलाओं को संपत्ति का अधिकार देने की बात करने वाले हिंदू कोड को समाज सुधार के लिए ज़रूरी मानते थे लेकिन नेहरू सरकार ने अंबेडकर के मंत्री रहते हुए हिंदू कोड को स्वीकार नहीं किया।
- डॉ. अंबेडकर को भारत रत्न सम्मान देने के लिए भी कोई पहल नहीं की गई। उनकी मौत के 34 वर्षों के बाद 1990 में वीपी सिंह सरकार ने उन्हें 'भारत रत्न' से सम्मानित किया जबकि कांग्रेस ने डॉ. अंबेडकर को 'भारत रत्न' से सम्मानित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया।
बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर से जुड़ी तमाम सच्चाइयां है। इन सच्चाइयों को जानना और समझना आधुनिक भारत के निर्माण के लिए बहुत ज़रूरी हैं। डॉ. अंबेडकर को जातियों की सीमा में बांधना और उन्हें सिर्फ़ दलितों के मसीहा के तौर पर पेश किया जाना उनके साथ बहुत बड़ा अन्याय होगा इसीलिए डॉ. अंबेडकर के मूल विचारों को Decode किया हैं।
अंबेडकर ने तो अपने स्कूल जीवन में ही तिरस्कार सहा था। स्कूल में बाकी दलित बच्चों की ही तरह अंबेडकर को भी बाकी सवर्ण बच्चों से अलग बिठाया जाता था। अंबेडकर के संस्कृत शिक्षक ने उन्हें संस्कृत पढ़ाने से ही इनकार कर दिया था। बाकी के शिक्षक अंबेडकर की किताबों को हाथ भी नहीं लगाते थे।
- अंबेडकर के साथ ये भेदभाव और तिरस्कार सिर्फ स्कूल जीवन तक ही सीमित नहीं रहा। उनका जीवन ऐसे तिरस्कार की घटनाओं से भरा हुआ है ।
- एक बार अंबेडकर और उनके भाई बैलगाड़ी से जा रहे थे, लेकिन जैसे ही गाड़ीवान को पता चला कि वो दोनों अछूत हैं, उन्हें बैलगाड़ी से नीचे फेंक दिया गया।
- निचली जाति से होने की वजह से अंबेडकर का शोषण हर स्तर पर होता रहा। अंबेडकर जब विदेश से पढ़कर हिंदुस्तान लौटे तो बड़ौदा के महाराजा ने उन्हें अपना सचिव बना दिया। बेशक अंबेडकर का पद बड़ा था लेकिन उनकी नौकरी के दौरान भी कोई उनकी इज्जत नहीं करता था। चपरासी अंबेडकर के हाथ में फाइल पकड़ाने के बजाए फेंक दिया करते थे। उन्हें पीने के लिए पानी नहीं दिया जाता था।
- मुंबई में अंबेडकर को उनके निचली जाति का होने की वजह से एक पारसी धर्मशाला से बाहर फेंक दिया गया था। उस दौर में अंग्रेजों से लड़ने के लिए पूरा देश खड़ा था तो दलित और शोषित लोगों के अधिकारों के लिए अकेले भीमराव अंबेडकर समाज के उच्च वर्ग और कांग्रेस से संघर्ष कर रहे थे।
- डॉ अंबेडकर का मानना था देश की तरक्की के लिए देश के हर वर्ग को समानता का अधिकार मिलना ज़रूरी है। बचपन में हुए भेदभावों की वजह से अंबेडकर हिंदू धर्म को छोड़ना चाहते थे।
- डॉ. अंबेडकर का मानना था कि हिंदू धर्म को छोड़ना धर्म परिवर्तन नहीं बल्कि गुलामी की ज़ंज़ीरें तोड़ने जैसा है। डॉ. अंबेडकर की इस घोषणा के बाद हैदराबाद के निजाम समेत कई मुस्लिम संगठनों ने अंबेडकर को धर्म परिवर्तन के ऑफर दिए, लेकिन बाबा साहब ने हर ऑफर को ठुकरा दिया क्योंकि वो अपने समाज के लोगों को इज्जत से जीने वाला धर्म देना चाहते थे इसीलिए वो हिंदू धर्म को छोड़कर 1956 में बौद्ध धर्म की शरण में चले गए।
- 15 अगस्त 1947 को आज़ादी का जश्न डॉ बाबा साहेब अंबेडकर के लिए एक बड़ी ज़िम्मेदारी लेकर आया। देश की नई सरकार को देश का संविधान बनाने के लिए एक काबिल व्यक्ति की तलाश थी जिसे कानून की जानकारी के अलावा देश और दुनिया की समझ और समाज की ज़रूरतों बारे में पूरी जानकारी हो और ये तलाश डॉ. अंबेडकर पर ख़त्म हुई।
- डॉ भीमराव अंबेडकर को देश का पहला कानून मंत्री बनाया गया जिन्होंने अपनी बिगड़ती सेहत के बावजूद महज 2 साल के अंदर देश को एक मजबूत संविधान दिया।
- अंबेडकर ने 1951 में हिंदू कोड बिल तैयार कर संसद में पेश किया जिसमें महिलाओं को भी समान अधिकार की बात कही गयी।
हिंदू कोड बिल के तहत पिता की संपत्ति में बेटी को समान अधिकार, विवाहित पुरूष को एक से अधिक पत्नी रखने पर प्रतिबंध, महिलाओं को भी तलाक़ का अधिकार शामिल था, लेकिन रूढ़िवादी हिंदू ताकतों और सरकार के अंदर ही बिल का विरोध करने वालों के सामने हिंदू कोड बिल लागू नहीं हो सका और सरकार में अपना प्रभाव घटने से निराश होकर डॉ. अंबेडकर ने 1951 में मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। अपने इस्तीफे में डॉ अंबेडकर ने लिखा--
'आज हिंदू कोड बिल की हत्या कर दी गयी। ऐसे में मेरा मंत्री बने रहने का अर्थ समझ में नहीं आता। बिल में शादी और तलाक संबंधी विधेयक पर दो दिन की चर्चा चली फिर प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने पूरे हिंदू कोड बिल को वापिस लेने की घोषणा कर दी, मैं हैरान रह गया। मैं ये मानने को तैयार नहीं हूं कि तलाक और विवाह संबंधी बिल को समय की कमी के चलते पास नहीं करवाया जा सकता, मुझे प्रधानमंत्री की नीयत पर शक नहीं है लेकिन हिंदू कोड बिल पास कराने के लिए जिस संकल्प और ईमानदारी की ज़रूरत थी वो उनमें नहीं दिखी।'
अपने इस्तीफे के बाद डॉ. भीमराव अंबेडकर ने ख़ुद राजनैतिक ज़िम्मेदारी से भले ही अलग कर लिया था लेकिन सामाजिक ज़िम्मेदारी को वो अपने अंतिम समय तक निभाते रहे। डॉ. भीमराव अंबेडकर को हम तक सिर्फ़ दलितों के मसीहा और संविधान निर्माता के तौर पर पेश किया गया है लेकिन उनकी भूमिका एक राष्ट्रनेता की रही जो चाहते थे देश का हर वर्ग आज़ादी की खुली हवा में सम्मान की सांसें ले सके। बाबा साहेब आंबेडकर विश्वमानव थे।

विरासत

अम्बेडकर की सामाजिक और राजनैतिक सुधारक की विरासत का आधुनिक भारत पर गहरा प्रभाव पड़ा है। स्वतंत्रता के बाद के भारत मे उनकी सामाजिक और राजनीतिक सोच को सारे राजनीतिक हलके का सम्मान हासिल हुआ। उनकी इस पहल ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों मे आज के भारत की सोच को प्रभावित किया। उनकी यह् सोच आज की सामाजिक, आर्थिक नीतियों, शिक्षा, कानून और सकारात्मक कार्रवाई के माध्यम से प्रदर्शित होती है। एक विद्वान के रूप में उनकी ख्याति उनकी नियुक्ति स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री और संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में कराने मे सहायक सिद्ध हुयी। उन्हें व्यक्ति की स्वतंत्रता में अटूट विश्वास था और उन्होने समान रूप से रूढ़िवादी और जातिवादी हिंदू समाज और इस्लाम की संकीर्ण और कट्टर नीतियों की आलोचना की है। उसकी हिंदू और इस्लाम की निंदा ने उसको विवादास्पद और अलोकप्रिय बनाया है, हालांकि उनके बौद्ध धर्म मे परिवर्तित होने के बाद भारत में बौद्ध दर्शन में लोगों की रुचि बढ़ी है।
अम्बेडकर के राजनीतिक दर्शन के कारण बड़ी संख्या में दलित राजनीतिक दल, प्रकाशन और कार्यकर्ता संघ अस्तित्व मे आये है जो पूरे भारत में सक्रिय रहते हैं, विशेष रूप से महाराष्ट्र में। उनके दलित बौद्ध आंदोलन को बढ़ावा देने से बौद्ध दर्शन भारत के कई भागों में पुनर्जागरित हुआ है। दलित कार्यकर्ता समय समय पर सामूहिक धर्म परिवर्तन के समारोह आयोजित उसी तरह करते रहते हैं जिस तरह अम्बेडकर ने 1956 मे नागपुर मे आयोजित किया था।
कुछ विद्वानों, जिनमें से कुछ प्रभावित जातियों से है का विचार है कि अंग्रेज अधिकतर जातियों को एक नज़र से देखते थे और अगर उनका राज जारी रहता तो समाज से काफी बुराईयों को समाप्त किया जा सकता था। यह राय ज्योतिबा फुले समेत कई थी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने रखी है।

आधुनिक भारत में कुछ लोग, अम्बेडकर के द्वारा शुरू किए गए आरक्षण को अप्रासांगिक और प्रतिभा विरोधी मानते हैं।

अम्बेडकर के बाद

पिछले वर्षों में लगातार बौद्ध समूहों और रूढ़िवादी हिंदुओं के बीच हिंसक संघर्ष हुये है। 1994 में मुंबई में जब किसी ने अम्बेडकर की प्रतिमा के गले में जूते की माला लटका कर उनका अपमान किया था तो चारों ओर एक सांप्रदायिक हिंसा फैल गयी थी और हड़ताल के कारण शहर एक सप्ताह से अधिक तक बुरी तरह प्रभावित हुआ था। जब अगले वर्ष इसी तरह की गड़बड़ी हुई तो एक अम्बेडकर प्रतिमा को तोड़ा गया। तमिलनाडु में ऊंची जाति के समूह भी बौद्धों के खिलाफ हिंसा में लगे हुए हैं।

विश्व के टॉप 100 विद्वानों में शीर्ष पर

कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्युयार्क, अमेरीका ने स्थापना वर्ष 1754, के 250 वर्ष (1754 से 2004) पूरे होने पर वर्ष 2004 में से, ऐसे 100 को कोलंबियन्स अहेड ऑफ देअर टाईम, (शॉर्टेड लीस्ट ऑफ नोटेबल पर्सन) नामक अपने सर्वेक्षण में अपने सौ ऐसे विद्वान छात्रों की एक लिस्ट जारी की, जिन्होंने दुनिया में महान कार्य किये और जो अपने-अपने क्षेत्र में महान एवं अद्वितीय रहे, जिसमें एक मात्र भारतीय बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर शामील थे। इस सूची की खास बात यह हैं इस में अमेरिका के 3 राष्ट्रपति सहित विश्व के 6 अलग-अलग देशों के राष्ट्राध्यक्ष एवं प्रधानमंत्री, 40 नोबेल पुरस्कार विजेताओं, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के पहले न्यायाधीश सहित 8 अन्य सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, 22 से अधिक अमेरिकी राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता शामिल हैं I इसके अलावे इस सूची में कई कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, विश्व के सर्वाधिक धनवान व्यक्ति वॉरेन बफे एवं कई दार्शनिक तथा विद्वान शामिल हैं I सूची में जो तीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैं, उनमें थॉडोर रूजवलेल्ट, फ्रेंकलिन रूजवेल्ट और डोविट एसनहॉवर सहित जर्जिया के राष्ट्रपति मिखैल साकाश्वीली और इथोपिया के राष्ट्रपति थॉमस हेनडिक, इटली के प्रधानमंत्री गियूलिनो अमाटो, अफगानिस्तान के प्रधानमंत्री अब्दुल जहीर, चीन के प्रधानमंत्री तंगशोयी और पोलैंड के प्रधानमंत्री भी शामिल हैं I कोलंबिया विश्वविद्यालय ने एक स्मारक बनाया है जिस पर इन 100 महान विद्वान विभूतियों के नाम लिखे गये।[20][21][22][23]
इन सभी सन्मानित विभूतियों के नाम को सही क्रम से लगाने के लिए वहां विद्वानों की एक कमेटी बनाई गई। उस कमेटी ने भारतीय संविधान के रचियता बाबासाहेब डॉ. बी. आर. अंबेडकर का नाम टॉप 100 में नम्बर वन (प्रथम) पर रखा। इस स्मारक का अनावरण राष्ट्राध्यक्ष एवं नोबेल शांति पुरस्कार विजेता बराक ओबामा ने किया, यह स्मारक कोलंबिया विश्वविद्यालय के केम्पस में शास से खडा है। कोलंबिया विश्वविद्यालय ने बाबासाहेब को आधुनिक भारत के निर्माता, भारत के स्वतंत्रता के लिए लढनेवाले महान स्वतंत्रता सेनानी, भारतीय संविधान निर्माता तथा भारत के करोड़ों शोषित, पिडित, दलित लोगों के मानव अधिकारों के लढनेवाले महान क्रांतिकारक बताकर उनके सन्मान में विश्वविद्यालय में विश्वभर के देशों के संविधानों और कानून की पढाई के उनके नाम से 'डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर अध्यासन' भी स्थापीत किया है। विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनॅशनल अॅण्ड पब्लिक अफेअर के हॉल में बाबासाहेब की शानदार पेन्टींग गर्व से लगवाई है। डॉ. आंबेडकर ने कोलंबिया विश्वविद्यालय से डबल एम.ए. और पीएच.डी पढाई महज ढाई वर्ष में पुरी कि थी। डॉ. अंबेडकर द्वारा सामाजिक न्याय व समता के संबंध में भारतीय दलित समाज को हक दिलाने वाले संविधान निर्माण की उपलब्धि से प्रभावित होकर कोलंबिया विश्वविद्यालय न्यूयार्क, अमेरिका ने जून 1952 में उन्हें 'डॉक्टरेट्' (डॉक्टर ऑफ लॉज्) की मानद उपाधि प्रदान की थी I
'कोलंबिया विश्वविद्यालय में पढते समय जीवन पहली बार मुझे सामाजित समानता का अनुभव आया' ऐसा बाबासाहेब ने सन 1930 में न्युयार्क टाईम्स को दिये हुए अपने इंटरव्हूव में कहां था।

दि ग्रेटेस्ट इंडियन (सबसे महानतम् भारतीय)

आधुनिक भारत के लिए महत्त्वपुर्ण योगदान और देश इंसानों के जीवन में अद्वितीय बदलाव लाने वाले महान शख्सियत खोजने के लिए भारत में दि ग्रेटेस्ट इंडियन" या सबसे महानतम् भारतीय शो का आयोजन अगस्त 2012 में CNN IBN और History TV18 द्वारा किया गया।
इसमें पहले भारत की 100 महान हस्तियों में से ओटिंग के जरीये पंडित नेहरू से ए.पी.जे. अब्दुल कलाम तक के दस नाम रखे गये और फिर सभी नागरिकों की ऑनलाइन राष्ट्रीय एवं आंतरराष्ट्रीय वोटिंग ओपन की गई, इसमें सर्वाधिक वोट डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर को मिले, वे टॉपटेन में नंबर वन पर ही चुने गयें।
वोटिंग मोबाईल, टेलिफोन और इंटरनेट के जरिए हुई थी। कुल ओटिंग 2 करोड़ हुई और इनमें सर्वाधिक वोट बाबासाहेब डॉ. बी. आर. अंबेडकर को प्राप्त हुए। देश में आधी शताब्धी से ज्यादा सत्ता में रहने वाली कांग्रेस, अर्थात देश को तीन प्रधानमंत्री देने वाले गांधी परिवार का कोई भी सदस्य जीत के क्रम में पांच स्थान तक भी अपनी जगह नहीं बना पाया हैं। इसमें डॉ. अब्दुल कलाम दुसरे नम्बर पर, वल्लभ भाई पटेल तीसरे स्थान पर है।

दस महान भारतीयों के वोट

  • डॉ. भीमराव अंबेडकर ~ 19,91,735
  • ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ~ 13,74,431
  • वल्लभ भाई पटेल ~ 25,58,835
  • अटल बिहारी वाजपेयी ~ 1,67,378
  • मदर टेरेसा ~ 92,645
  • जे. आर. डी. टाटा ~ 50,407
  • सचिन तेंदुलकर ~ 47,706
  • इंदिरा गांधी ~ 17,641
  • लता मंगेशकर ~ 11,520
  • जवाहरलाल नेहरू ~ 9,921

बहुश्रुत आंबेडकर

  • समाज सुधारक आंबेडकर
  • अर्थशास्त्री आंबेडकर
  • समाजशास्त्री आंबेडकर
  • इतिहासकार आंबेडकर
  • विधिवेत्ता आंबेडकर
  • मानव विज्ञानी आंबेडकर
  • सत्याग्रही आंबेडकर
  • राजनीतिज्ञ आंबेडकर
  • दलित मसिहा आंबेडकर
  • धर्मशास्त्री आंबेडकर
  • पत्रकार आंबेडकर
  • ग्रंथकार आंबेडकर
  • पुस्तक प्रेमी आंबेडकर
  • संविधानविद् आंबेडकर
  • भाषाविद आंबेडकर
  • प्राध्यापक आंबेडकर

बाबासाहेब के विचार

डॉ बाबासाहेब आंबेडकर के विविध विषयों पर प्रेरणादायी एवं अनमोल विचार[31][32]

समाज

  • सागर में मिलकर अपनी पहचान खो देने वाली पानी की एक बूँद के विपरीत, इंसान जिस समाज में रहता है, वहां अपनी पहचान नहीं खोता।
  • रात रातभर मैं इसलिये जागता हूँ क्‍योंकि मेरा समाज सो रहा है।
  • राजनीतिक अत्‍याचार सामाजिक अत्‍याचार की तुलना में कुछ भी नहीं है और एक सुधारक जो समाज को खारिज कर देता है वो सरकार को खारिज कर देने वाले राजतीतिज्ञ से कहीं अधिक साहसी हैं।
  • मैं किसी समुदाय की प्र‍गति महिलाओं ने जो प्रगति हांसिल की है उससे मापता हूँ।
  • जो कौम अपना इतिहास नहीं जानती, वह कौम कभी भी इतिहास नहीं बना सकती।
  • राष्‍ट्रवाद तभी औचित्‍य ग्रहण कर सकता है, जब लोगों के बीच जाति, नरल या रंग का अन्‍तर भुलाकर उसमें सामाजिक भ्रातृत्‍व को सर्वोच्‍च स्‍थान दिया जाये।
  • न तो भगवान है और न ही आत्मा हमारे समाज को बचाने के लिए कर सकते हैं

धर्म

1} मैं ऐसे धर्म को मानता हूँ जो स्‍वंतत्रता, समानता और भाईचारा सिखाता है।
2} यदि हम एक संयुक्‍त एकीकृत आधुनिक भारत चाहते हैं तो सभी धर्मों के शाश्‍त्रों की संप्रभुता का अंत होना चाहिए।
3} जो धर्म जन्‍म से एक को श्रेष्‍ठ और दूसरे को नीच बनाए रखे, वह धर्म नहीं, गुलाम बनाए रखने का षड़यंत्र है।
4} हिंदू धर्म में, विवेक, कारण और स्‍वतंत्र सोच के विकास के लिए कोई गुंजाइश नहीं हैं।
5} मैं यह नहीं मानता और न कभी मानूंगा कि भगवान बुद्ध विष्‍णु के अवतार थे। मैं इसे पागलपन और झूठा प्रचार-प्रसार मानता हूँ।
6} लोग और उनके धर्म सामाजिक मानकों द्वारा सामाजिक नैतिकता के आधार पर परखे जाने चाहिए। अगर धर्म को लोगो के भले के लिए आवशयक मान लिया जायेगा तो और किसी मानक का मतलब नहीं होगा।
7} धर्म में मुख्‍य रूप से केवल सिद्धांतों की बात होनी चाहिए। यहां नियमों की बात नहीं हो सकती।
8} मनुष्‍य एवं उसके धर्म को समाज के द्वारा नैतिकता के आधार पर चयन करना चाहिये। अगर धर्म को ही मनुष्‍य के लिए सब कुछ मान लिया जायेगा तो किन्‍ही और मानको का कोई मूल्‍य नहीं रह जायेगा।

जाति प्रथा

1} कई महात्‍मा आये और चले गये परन्‍तु अछुत फिर भी अछुत ही रहे।
2} जाति प्रथा को खत्म करने के लिए आपको न सिर्फ धर्मशास्त्रों को त्यागना होगा, बल्कि उनके प्रभुत्व को भी मानने से ठिक उसी तरह इंकार करना होगा जैसे भगवान गौतम बुद्ध और गुरू नानक ने किया था।
3} मनुवाद को जड़ से समाप्‍त करना मेरे जीवन का प्रथम लक्ष्‍य है।

राजनीति

  • एक सफल क्रांति के‍ लिए सिर्फ असंतोष का होना पर्याप्‍त नहीं है। जिसकी आवश्‍यकता है वो है न्‍याय एवं राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों में गहरी आस्‍था।
  • कानून और व्‍यवस्‍‍था राजनीतिक शरीर की दवा है और जब राजनीतिक शरीर बीमार पड़े तो दवा जरूर दी जानी चाहिए।
  • मैं राजनीति में सुख भोगने नहीं बल्कि अपने सभी दबे-कुचले भाईयों को उनके अधिकार दिलाने आया हूँ।
  • आज भारतीय दो अलग-अलग विचारधाराओं द्वारा शाशित हो रहे हैं। उनके राजनीतिक आदर्श जो संविधान के प्रस्‍तावना में इंगित हैं वो स्‍वतंत्रता, समानता, और भाई-चारे को स्‍थापित करते हैं, और उनके धर्म में समाहित सामाजिक आदर्श इससे इनकार करते है।

अर्थशास्त्र

  • इतिहास बताता है‍ कि जहाँ नैतिकता और अर्थशास्‍त्र के बीच संघर्ष होता है वहां जीत हमेशा अर्थशास्‍त्र की होती है। निहित स्‍वार्थों को तब तक स्‍वेच्‍छा से नहीं छोड़ा गया है जब तक कि मजबूर करने के लिए पर्याप्‍त बल ना लगाया गया हो।

स्वतंत्र्यता

    • जब तक आप सामाजिक स्‍वतंत्रता नहीं हासिल कर लेते, कानून आपको जो भी स्‍वतंत्रता देता है वो आपके लिये बेमानी हैं।
  • हर व्‍यक्ति जो मिल के सिद्धांत कि एक देश दूसरे देश पर शाशन नहीं कर सकता को दोहराता है उसे ये भी स्‍वीकार करना चाहिए कि एक वर्ग दूसरे वर्ग पर शाशन नहीं कर सकता।
    • हमारे पास यह स्‍वतंत्रता किस लिए है ? हमारे पास ये स्‍वत्‍नत्रता इसलिए है ताकि हम अपने सामाजिक व्‍यवस्‍था, जो असमानता, भेद-भाव और अन्‍य चीजों से भरी है, जो हमारे मौलिक अधिकारों से टकराव में है को सुधार सकें।
    • राष्‍ट्रवाद तभी औचित्‍य ग्रहण कर सकता है, जब लोगों के बीच जाति, नरल या रंग का अन्‍तर भुलाकर उसमें सामाजिक भ्रातृत्‍व को सर्वोच्‍च स्‍थान दिया जाये।
    • मन की स्‍वतंत्रता ही वास्‍तविक स्‍वतंत्रता है।
    • स्‍वतंत्रता का रहस्‍य, साहस है और साहस एक पार्टी में व्‍यक्तियों के संयोजन से पैदा होता है।है।

शिक्षा

  • शिक्षा जितनी पुरूषों के लिए आवशयक है उतनी ही महिलाओं के लिए।
  • मेरा विद्यार्थीओं से यह कहना है की केवल भीड के पिछे मत जाना। विद्या, प्रज्ञा, शील, करूणा एवं मित्रता इन पंच तत्वों के अनुसार हर विद्याथीओं ने अपना चरित्र बनाना चाहिए और इस मार्ग पर चाहे अकेले चलना पडे पुरे मनोधर्य एवं निष्ठा से जाना चाहिए। अपने विवेक से जो मार्ग उचित लगता हो उसी मार्ग पर चलना चाहिए।

समानता

  • समानता एक कल्‍पना हो सकती है, लेकिन फिर भी इसे एक गवर्निंग सिद्धांत रूप में स्‍वीकार करना होगा।
  • न्‍याय हमेशा समानता के विचार को पैदा करता है।

भारत

  • हम सबसे पहले और अंत में भारतीये हैं।
  • मुझे यह अच्छा नहीं लगता, जब कुछ लोग कहते है की हम पहले भारतीय है और बाद में हिंदू अथवा मुसलमान। मुझे ये स्विकार नहीं हैं। धर्म, संस्कृती, भाषा तथा राज्य के प्रति निष्ठा से उपर हैं – भारतीय होने की निष्ठा। मैं चाहता हूँ की, लोग पहले भी भारतीय हों और अंततक भारतीय रहे–भारतीय के अलावा कुछ नहीं।

जीवन

  • इंसान का जीवन स्‍वतंत्र है। इंसान सिर्फ समाज के विकास के लिए नहीं पैदा हुआ है, बल्कि स्‍वयं के विकास के लिए पैदा हुआ है।
  • जीवन लम्‍बा होने की बजाय महान होना चाहिए।
  • मनुष्‍य नश्‍वर है। उसी तरह विचार भी नश्‍वर हैं। एक विचार को प्रचार प्रसार की जरूरत होती है, जैसे कि एक पौधे को पानी की नही तो दोनों मुरझा कर मर जाते हैं।
  • बुद्धि का विकास मानव के अस्तित्‍व का महत्‍वपूर्ण लक्ष्‍य होना चाहिए।
  • उदासीनता लोगों को प्रभावित करने वाली सबसे खराब किस्‍म की बिमारी है।
  • मैं तो जीवन भर कार्य कर चुका हूँ अब इसके लिए नौजवान आगे आए।
  • इस दुनिया में महान प्रयासों से प्राप्‍त किया गया को छोडकर और कुछ भी बहुमूल्‍य नहीं है।
  • ज्ञान व्‍‍यक्ति के जीवन का आधार हैं।
  • उन्होंने मुझे काले पर्दे से ढकने की कोशिश की लेकिन उन्हें नहीं पता था की मैं सूर्य हूँ... फिर उन्होंने मुझे मिट्टी में दबाने की कोशिश की लेकिन वो नहीं जानते थे की मैं बीज हूँ !
  • आत्म सम्मान के साथ इस दुनिया में जीना सीखो।
  • अच्छा आदमी एक मास्टर नहीं हो सकता है और मास्टर एक अच्छा आदमी नहीं हो सकता

संविधान

  • यदि मुझे लगा कि संविधान का दुरूपयोग किया जा रहा है, तो मैं इसे सबसे पहले जलाऊंगा।
  • संविधान, यह एक मात्र वकीलों का दस्‍तावेज नहीं। यह जीवन का एक माध्‍यम है।

फिल्म

जब्बार पटेल ने सन 2000 मे डॉ॰ बाबा साहेब अम्बेडकर नामक हिन्दी फिल्म बनाई थी। इसमे अम्बेडकर की भूमिका माम्मूटी मे निभाई थी। भारत के राष्ट्रीय फ़िल्म विकास निगम और सामाजिक न्याय मंत्रालय के द्वारा प्रायोजित, यह फिल्म प्रदर्शन से पहले एक लंबी अवधि तक विवादो मे फँसी रही।
यू. सी. एल. ए. मे मानव शास्त्र के प्रोफेसर और ऐतिहासिक नृवंश विवरणकार, डॉ॰ डेविड ब्लुंडेल फिल्मों की एक श्रृंखला बनाने की दीर्घकालिक परियोजना बनाई है जो उन घटनाओं पर आधारित है जो भारत में समाज कल्याण की स्थिति के बारे में ज्ञान और इच्छा को प्रभावित करती है। ए राएज़िग लाइट डॉ॰ बी आर अम्बेडकर के जीवन और भारत में सामाजिक कल्याण की स्थिति पर आधारित है।

नाटक

राजेश कुमार का भीमराव अम्बेडकर और गांधी नाटक[33]अरविन्द गौड़ के निर्देशन मे अस्मिता थियेटर ग्रुप द्वारा पूरे देश मे लगातार मन्चन।

बाबासाहेब का समग्र साहित्य, लेखन

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर बहूत प्रतिभाशाली एवं जुंझारू लेखक थे। बाबासाहेब को 6 भारतीय और 4 विदेशी ऐसे कुल दस भाषाओं का ज्ञान था, अंग्रेजी, हिन्दी, मराठी, पालि, संस्कृत, गुजराती, जर्मन, फारसी, फ्रेंच और बंगाली ये भाषाएं वे जानते थे। बाबासाहेब ने अपने समकालिन सभी राजनेताओं की तुलना में सबसे अधिक लिखा है। सामाजिक संघर्ष में हमेशा सक्रिय और व्यस्त होने के बावजुद भी उनकी इतनी सारी किताबें, निबंध, लेख एवं भाषणों का इतना बडा यह संग्रह वाकई अद्भुत है। वे असामान्य प्रतिभा के धनी थे और यह प्रतिभा एवं क्षमता उन्होंने अपने कठीन परिश्रम से हासित की थी। वे बडे साहसी लेखक या ग्रंथकर्ता थे, उनकी हर किताब में उनकी असामान्य विद्वता एवं उनकी दुरदर्शता का परिचय होता है।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के ग्रंथ भारत में ही नहीं बल्की पुरे विश्व में बहुत प्रसिद्ध है, और पुरे विश्व में पढी जाती है। उन्होंने लिखे हुए महान भारतीय संविधान को भारत का राष्ट्रग्रंथ माना जाता है, भारतीय संविधान किसी भी धर्मग्रंथ से कम नहीं है तथा ओ विश्व के प्रमुख महानत् किताबों में एक है। भगवान बुद्ध और उनका धम्म यह उनका ग्रंथ भारतीय बौद्धों का धर्मग्रंथ है तथा बौद्ध देशों में बहूत मशहूर एवं महत्वपुर्ण है। उनके डि.एस.सी. प्रबंध रूपये की समस्या से भारत के केन्द्रिय बैंक यानी भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना हुई है। राजनिती, अर्थशास्त्र, मानवविज्ञान, धर्म, समाजशास्त्र, कानून आदी क्षेत्रों में उन्होंने किताबें लिखी है।[34]

ग्रंथकार डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की समग्र लेखन सूची
{I} Books and Monograph
[1] Administration and finance of the East India Company (Thesis for MA Degree, May 2015)
[2] The Evolution of Provincial Finance in British India (Thesis for PhD, 1917, published 1925)
[3] The problem of the Rupees: Its Origin and Its Solution (Thesis for DSc, Published 1923)
[4] Annihilation of Caste (May 1936)
[5] Which way to Emancipation? (May 1936)
[6] Federation versus Freedom (1936)
[7] Pakistan or the Partition of India / Thoughts on Pakistan (1940)
[8] Rande, Gandhi and Jinaah (1943)
[9] Mr. Gandhi and the Emancipation of the Untouchables (Sep 1943)
[10] What Congress and Gandhi Have Done to the Untouchables (June 1945)
[11] Communal Deadlock and a Way to Solve It (May 1946)
[12] Who Were the Shudras? (October 1946)
[13] A critique of The Proposals of Cabinet Mission for Indian Constitution changes in so far as they affect the Scheduled Castes (Untouchable) (1946)
[14] The Cabinet Mission and the Untouchables (1946)
[15] States and Minorities (1947)
[16] Maharashtra as a Linguist Province (1948)
[17] The Untouchables: Who Were They are Why The Become Untouchables (October 1948)
[18] Thoughts on Linguistic States: A critique of the Report of the States Reorganization Commission (Published 1955)
[19] The Buddha and His Dhamma (1957)
[20] Riddle's in Hinduism
[21] Dictionary of Pali Language (Pali-English)
[22] The Pali Grammar
[23] Waiting for a Visa (Autobiography)
[24] A people at Bay
[25] Untouchables or the Children of India's Ghetto
[26] Can I be a Hindu?
[27] What the Brahmins Have Done to the Hindus
[28] Essays of Bhagwat Gita
[29] India and Communism
[30] Revolution and Counter-revolution in Ancient India
[31] The Buddha or Karl Marx
[32] Constitution and Constitutionalism

{II} Memoranda, Evidence and Statement's
[33] On Franchise and Framing Constituencies (1919)
[34] Statement of Evidence to the Royal Commission of Indian Currency (1926)
[35] Protection of the Interests of the Depressed Classes (May 29, 1928)
[36] State of Education of the Depressed Classes in the Bombay Presidency (1928)
[37] Constitution of the Government of Bombay Presidency (May 17, 1929)
[38] A Scheme of Political Safeguards for the protection of the Depressed in the Future Constitution of a Self- governing India (1930)
[39] The Claims of the Depressed Classes for Special Represention (1931)
[40] Franchise and Tests of Untouchability (1932)
[41] The Cripps Proposals on Constitutional Advancement (July 18, 1942)
[42] Grievances of the Schedule Castes (Oct 29, 1942)

{III} Research Papers, Articles and Books Reviews
[43] Castes in India: Their Genius, Mechanism and Development (1918)
[44] Mr. Russel and the Reconstruction of Society (1918)
[45] Small Holding In India and Their Remedies (1918)
[46] Currency and Exchanges (1925)
[47] The Present Problem of Indian Currency (Apr 1925)
[48] Report of Taxation Enquiry Committee (1926)
[49] Thoughts on the Repform of Legal Education in the Bombay Presidency (1936)
[50] The Rise and Fall of Hindu Women (1950)
[51] Need for checks and Balances (Apr 23, 1953)
[52] Buddha Pooja Path (Marathi) (Nov 1956)

{IV} Preface and Forewords
[53] Forward to Untouchable Workers of Bombay City (1938)
[54] Forward to commodity Exchange (1947)
[55] Preface to the Essence of Buddhism (1948)
[56] Forward to Social Insurance and India (1948)
[57] Preface to Rashtra Rakshake Vaidik Sadhan (1948)

बाबासाहेब के प्रशंसक

हम डॉ. अंबेडकर के जीवन और कार्य से प्रेरणा लेकर अपना संघर्ष भी उन्हीं आधारों पर चलायेंगे जिन आधारों पर डॉ. अंबेडकर ने भारत में समाज परिवर्तन का प्रयत्न किया और सफलता पायी।

हर व्यक्ति अपनी निहित क्षमता को हासिल कर सकता है। ठीक उसी तरह, जिस तरह एक दलित होने के बावजूद डॉ. अंबेडकर ने अपनी क्षमतानुरूप कार्य करते हुए, अपने आप को इतनी ऊंचाइयों पर उठाया और एक ऐसे संविधान का निर्माण किया जो सारे भारतीयों के अधिकारों की रक्षा करता है।[35]

डॉ. अंबेडकर एक ऐसे विद्वान है और सुविद्या वकील भी है कि उनके सामनें अनकों को सर्मचार हो जाना पडता है। वे अपनी प्रचूर विद्वता से अनेकों के ह्रदयों को छूने का सामर्थ्य रखते है। उनके त्याग की परिसीमा बहुत व्यापक है, वे अपने कार्य में तहीनता के साथ डूब जाते है। वे चाहे तो कभी भी युरोप में जाकर बस सकते है, मगर वे उसकी चाहत नहीं रखते। अपने हरीजनों (दलितों) का उत्थान करना ही उनके जीवन का प्रमुख लक्ष्य रहा है। उन्हे बार बार शोषित एवं अछूत वर्ग के व्यक्ती होने के नाते ही संबोधित किया जाता है, लेकिन बुद्धिमत्ता की कसौटी पर वे हजारों सुशिक्षीत हिंदू विद्वानों से भी श्रेष्ठ दर्जे के विद्वान है। उनका निजी जीवन किसी भी उच्च दर्जे के निर्मल एवं स्वच्छ व्यक्ति से कम नहीं है। आज की तारिख में वे कानून के एक सुविख्यात विधिवेत्ता है, कल वे किसी भी उच्च न्यायालय के न्यायधीश भी बन सकते। दुसरें शब्दों में इस देश के शासन - प्रशासन में ऐसा कोई भी पद नहीं हैं, जिसपर वे आसीन न हो सकें।

साँचा:''

डॉ. अंबेडकर को भारतीय हिन्दू समाज के तमाम अत्याचारी स्वरूपों के खिलाप एक विद्रोह के प्रतिक क् रूप में याद किया जायेगा। उन उत्याचारी स्वरूपों के खिलाप जो आवाज उन्होंने बुलंद की है, उससे लोगों के दिल-दिमागों को झकझोर कर जागृत कर दिला है। यद्यपी उन्हें एक विवादास्पद व्यक्ति के तौर पर जाना जाता हो लेकिन वास्तविकता यहीं हैं की उन्होंने देश के शासन प्रशासन के प्रत्येंक मुद्दो पर बगावत की है उन मुद्दों पर हर किसीने बगावत करनी चाहिए। डॉ. अंबेडकर इसलिए भारत के अति विशिष्ट लोगों में भी एक असामान्य एवं श्रेष्ठतम व्यक्तिमत्व थे।

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने बौद्ध धर्म एक ऐसा मजबूत खंभा भारत की भूमी पर गाढ दिया हैं कि जिसे अन्य कोई भी हिला नहीं सकेगा

डॉ. आंबेडकर अर्थशास्त्र में मेरे पिता है।

डॉ. आंबेडकर निर्वीवाद रूप से एक ऐसे दैदिप्यमान व्यक्तिमत्व थे जिन्होंने जम्बुमहाद्विप भारत के इतिहास में अपना ऐतिहासीक योगदान दिया है, और यह योगदान उन्होंने ऐसे समय पर दिया जब भारत एक बदलती हुयी परिस्थीतियों के बीच यहां की सामाजिक संरचना और जीवन पर अपना महत्त्वपूर्ण प्रभाव डाल रहा था।
—व्ही. एन. यू. (बर्मा के भू.पू. प्रधानमंत्री)

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