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Friday, July 24, 2020

आपदा क्या है? आपदा के प्रकार एवं प्रबंधन

आपदा (Disaster)

आपदा का अर्थ है विपत्ति, मुसीबत या कठिनाई। आपदा को अंग्रेजी में
 डिजास्टर (Disaster) कहते हैं।

Disaster Management
Image Source : 123rf
डिजास्टर शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है। डेस अर्थात
 बुरा या अशुभ और ऐस्ट्रो का मतलब स्टार या नक्षत्र। ज्योतिष विज्ञान के अनुसार 'जब तारे बुरी स्थिति में होते हैं तब बुरी घटनायें होती हैं।' इसीलिए पुराने जमाने में किसी
 विपत्ति, मुसीबत और कष्ट का कारण बुरा नक्षत्रों का प्रकोप माना जाता था।
 वर्तमान में आपदा का अर्थ उन प्रकृति और मानव जनित अप्रत्याशित या
 त्वरित घटनाओं से लिया जाता है जो मानव पर कहर बरसाती है।
आपदा शब्द ज्योतिष विज्ञान से आया है इसका अर्थ होता है कि 'जब तारे बुरी स्थिति में होते हैं तब बुरी घटनायें होती हैं।'

आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 2 (डी) के अनुसार, ‘‘आपदा का अर्थ किसी भी क्षेत्र में प्राकृतिक या मानव निर्मित कारणों से होने वाली दुर्घटना, घटना, आपदा या गंभीर घटना, या दुर्घटना या लापरवाही से है जिसके परिणामस्वरूप जीवन का पर्याप्त नुकसान होता है या मानव पीड़ा या क्षति, और संपत्ति का विनाश, या क्षति, या पर्यावरण का क्षरण होता है तथा वह घटना ऐसी प्रकृति और परिमाण की हो जिस से उभर पाना प्रभावित क्षेत्र के समुदाय की क्षमता से परे हो ।’’

प्रकोप और आपदा में अंतर -

प्रकोप सामान्यतया उन प्राकृतिक एवं मानवीय प्रक्रमों से सम्बन्धित
 होते हैं, जो चरम घटनाएं उत्पन्न करते हैं जबकि आपदा वे त्वरित और
अचानक होने वाली घटनाएं होती है जो मानव समाज और जैव समुदाय को
 अत्यधिक क्षति पहुंचाती हैं।

प्रकोप आपदा से पूर्व की स्थिति है और इसमें आपदा के आगमन का
खतरा मौजूद रहता है और इससे मनुष्य की आबादी के नष्ट होने का खतरा
बना रहता है।
आपदाओं को सदा मानव के सन्दर्भ में देखा जाता है।
 आपदाओं की गहनता तीव्रता एवं परिमाण का आंकलन धन जन की हानि के
 परिप्रेक्ष्य में किया जाता है।

प्रकोप एक प्राकृतिक घटना है जबकि आपदा इसका परिणाम है।
प्रकोप एक प्राकृतिक घटना है जिससे जान माल दोनों का नुकसान होता है
जबकि आपदा इस संकट का अनुभव है।’’
(जान बिहरो-डिसास्टर 1980)
 आपदा का कार्य मानवीय कार्य भी हो सकता है जैसे सड़क पर हुई
 कोई दुर्घटना और औद्योगिक विस्फोट अथवा प्राकृतिक प्रकोप भी हो सकता 
है जैसे ज्वालामुखी, भूकम्प आदि। यदि भूकम्प .4.0 से कम परिमाण का आता
 है तो वह उस क्षेत्र के लोगों के लिए आपदा नहीं होगी क्योंकि इसका प्रभाव
  उस क्षेत्रों के लोगों पर नगण्य होगा और यदि भूकम्प 7.0 से अधिक परिणाम
 वाले आते हैं तो वह उस स्थान को तहस-नहस कर देते हैं।
अप्रैल 2015 में
 नेपाल में आया भूकम्प प्राकृतिक आपदा का उदाहरण है।

आपदा के प्रकार (Types of Disaster)

आपदा जीव-जन्तु वनस्पति तथा मानव के लिए
 हानिकारक है। जो आपदाएं प्रकृति की व्यवस्था में असन्तुलन उत्पन्न होने के
 कारण होती है, प्राकृतिक आपदायें कहलाती हैं तथा जो आपदाएं मानव जनित क्रियाओं के दुष्परिणाम के कारण होती हैं, मानव जनित आपदाएं कहलाती हैं। 

भूगर्भीय आपदा

  1. ज्वालामुखी
  2. भूकम्प
  3. भूस्खलन
  4. हिमस्खलन
  5. सिंक होल

जलीय आपदा

  1. बाढ़
  2. लिम्निक उद्गार
  3. सुनामी
  4. बादल का फटना

मौसमी आपदा

  1. बर्फानी तूफान
  2. चक्रवात
  3. सूखा
  4. आकाशीय विद्युत आपदा
  5. उपल वृष्टि
  6. गर्म लहर
  7. शीतलहर
  8. हरिकेन
  9. टारनेडो
  10. हिमावरण या हिमद्रवण
  11. समुद्र तल में परिवर्तन

प्रश्नोतर प्रकोप एवं आपदा

  1. पृथ्वी एवं उल्काओं का टकराव
  2. उल्काओं में आपसी टक्कर

मानव कृत प्रकोप एवं आपदा

  1. भौतिक आपदा
  2. वायु और जल प्रदूषण
  3. मृदा अपरदन
  4. भूस्खलन
  5. बांध जनित भूकम्प
  6. क्षरण तथा दावानल

रसायनिक आपदा

  1. नाभिकीय विस्फोट
  2. रेडियोधर्मी विकिरण
  3. जहरीले रसायनों का रिसाव
  4. सागर में तेल वाहक टेकर से पैट्रोलियम का रिसाव

जैविक आपदा

  1. जनसंख्या विस्फोट
  2. युद्ध/लड़ाई/दुश्मन का आक्रमण 
  3. महामारी
  4. कीट समूहन
  5. आतंकवाद आपदा

प्रौद्योगिकी आपदा

  1. परिवहन दुर्घटनाएं
  2. औद्योगिक दुर्घटना
  3. नाभिकीय युद्ध

आपदाओं की प्रकृति (Nature of Disaster)

        प्रारम्भ में मनुष्य पर पर्यावरण के सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता
 था जिसे निश्चयवाद की संज्ञा दी जाती है। वर्तमान में उद्योगों तथा
प्रौद्योगिकी के विकास के कारण पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है जिसके 
कारण पर्यावरण पर मानवीय कार्यों के परिणामों पर अधिक जोर दिया जाने 
लगा है क्योंकि पर्यावरण में परिवर्तन का प्रभाव मानव समाज पर पड़ने लगा
 है और इसका प्रभाव बाढ़, सूखा, भूकम्प आदि प्रकोप व आपदा के रूप में
 दिखाई पड़ने लगा है। इसका अध्ययन विभिन्न विषयों में अलग-अलग
 दृष्टिकोंण से किया जाने लगा है। अभी तक छह दृष्टिकोंण सामने आए हैं।

  1. भौैगोलिक दृष्टिकोंण – इस दृष्टिकोंण के प्रमुख प्रर्वतक हारलैड वैराजे
    और गिलनर है। इसमें आपदा का विस्तार, आने के कारणों तथा समाज पर
    उसके प्रमुख प्रभावों तथा उससे निपटने के लिए विभिन्न उपायों पर चर्चा की 
    गई है। 
  2. समाजशास्त्रीय दृष्टिकोंण – इसमें आपदाओं का समाज, मानव के 
    रहन-सहन तथा व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ता है का अध्ययन किया जाता
    है। इसमें मनोविज्ञान आधारित प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया पद्धति का आपदा के सन्दर्भ
    में अध्ययन किया जाता है। रस्सल आर डाइनेस और एनरिको एल क्वैरेनटेलि
    इस दृष्टिकोंण के प्रमुख प्रवर्तक हैं। 
  3. शास्त्रीय दृष्टिकोंण – इसमें सभ्यताओ के नष्ट होने में आपदाओं की
     भूमिकाओं पर चर्चा की गई है। इसमें आपदाओं का सामाजिक आर्थिक विकास
     पर क्या प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, इसका अध्ययन किया जाता है। आपदा के 
    कारण प्रभावित समुदाय अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में असमर्थ रहता
     है। इसी कारण लोगों के प्रवजन या स्थानान्तरण की दशा का जिक्र किया
    गया है।
  4. विकासात्मक दृष्टिकोंण – आपदाओं के प्रभाव सबसे अधिक विकासशील
     देशों में होता है क्योंकि गरीबी के कारण प्राकृतिक प्रकोप की मार और भी
    घातक हो जाती है। इसी कारण इस दृष्टिकोंण में सहायता और राहत कार्य,
    शरणाथ्र्ाी प्रबंध, स्वास्थ्य, देखरेख और भुखमरी जैसी समस्याओं तथा इससे
     निपटने के उपायों पर चर्चा की गई है। 
  5. आपदा औषधि औैर महामारी विज्ञान – आपदा के दौरान सार्वजनिक
     स्वास्थ्य सेवाएं बाधित हो जाती है जिसके कारण पड़े पैमाने पर लोगों की
     मृत्यु तक हो जाती है। इसी कारण इसमें मृत्यु के प्रबंधन, क्षत विक्षत रोगियों
    का इलाज, संक्रामक और महामारी आदि से ग्रसित रोगियों के उपचार पर बल
    दिया जाता है। 
  6. तकनीकी दृष्टिकोंण – इसमें आपदा के विभिन्न पक्षो के अध्ययन के
    लिए विभिन्न विज्ञानों जैसे आपदा विज्ञान, ज्वालामुखी विज्ञान, भू आकृति विज्ञान, भूगर्भ शास्त्र तथा भौतिकी का सहारा लिया जाता है। प्राकृतिक और
     शारीरिक विज्ञान इस प्रकार के दृष्टिकोण पर महत्व देते हैं।

आपदाओं के कारण (Causes of Disaster)

प्रकृतिजन्य और मानव जनित अप्रत्याशित एवं दुष्प्रभाव वाली चरम
 घटनाओं को आपदा कहते हैं। ये आपदाएं कभी त्वरित एवं कभी मन्द गति
 से घटित होती है। इन आपदाओं के घटने के कई विवर्तनिक तथा मानवजनित
कारण है जिनका संक्षिप्त में यहाँ विवरण दिया जा रहा है -

  1. पृथ्वी की ऊपरी पपड़ी छोटे-बड़े भिन्न-भिन्न भागों में विभक्त है जिसे 
    प्लेट की संज्ञा दी गई है। ये प्लेट गतिशील है।
    इनकी गति कभी
     एक-दूसरे के सामने, तथा कभी एक दूसरे के विपरीत दिशा में होती
    है। जब प्लेट विपरीत दिशा में गति करती है तो पृथ्वी के अन्दर का
    तप्त तथा तरल मौमा, सतह पर आकर फैल जाता है तथा शान्त
     ज्वालामुखी का उद्गार होता है। जब ये प्लेट आमने-सामने टकराती
     है तो भारी प्लेट हल्के पदार्थ से निर्मित प्लेट के नीचे चली जाती है
     तथा अधिक गर्मी से पिघल जाती है। जिससे अधिक परिमाण वाले
     भूकम्प आते हैं तथा विस्फोटक प्रकार वाले ज्वालामुखी का उद्गार
    होता है।
     
  2.      पृथ्वी के अन्वजति शक्तियों के कारण चट्टानों में क्षैतिज तथा
     ऊर्ध्वाधर गतियां होती हैं। इन्हीं गतिशीलता के कारण वलन एवं
     
    भ्रंशन की क्रिया होती है। भ्रंशन के कारण एक भाग ऊपर उठ जाता 
    है तथा एक भाग नीचे धंस जाता है। धरातलीय भाग में अगल-बगल 
    तथा ऊपर-नीचे खिसकाव होने से पृथ्वी पर कम्पन पैदा होता है तथा 
    भूकम्प आता है।
  3.        धरातलीय भाग पर जब जल की अपार राशि का भण्डारण हो जाता
     है तो उससे उत्पन्न अत्यधिक भार तथा दबाव के कारण जल भण्डार
     की तली के नीचे चट्टानों में हेर फेर होने लगता है और जब यह
     परिवर्तन शीलता से होता है तो भूकम्प का अनुभव किया जाता है। 
  4.         भूपटल के नीचे जब किसी कारण से जल पहुंच जाता है तो वह
     अत्यधिक ताप के कारण जलवाष्प में बदल जाता है। ये गैसे ऊपर
     जाने का प्रयास करती है तथा भूपटल पर नीचे से धक्के लगाती हैं, जिससे ऊपरी भाग का दबाव कम हो जाता है तथा ये विस्फोट के
     साथ ठोस एवं गैसीय पदार्थ निकलता है। जिससे ज्वालामुखी का
     उद्गार होता है तथा भूकम्प का अनुभव किया जाता है
    । 
  5.         सागरीय तली में अचानक विवर्तनिक उथल-पुथल के कारण अपार
     सागरीय जलराशि का विस्थापन होता है तथा सुनामी की उत्पत्ति
     होती है। सागरीय तली में उथल-पुथल कई कारणों से होती है। जैसे
     सागरीय तली में ज्वालामुखी का उद्गार, प्लेटों के खिसकाव के
     कारण भूकम्प, सागरीय भूस्खलन, बड़े-बड़े हिमखण्डों की फिसलन
     आदि है। सुनामी लहरों की तटवर्ती क्षेत्रों में ऊचाई अधिक हो जाती 
    है जिसके कारण तबाही मचाती है।
  6. उष्ण कटिबन्धीय विक्षोभ, तूफान, हरिकेन या टाइफून ये उष्ण
     कटिबन्धीय चक्रवातों के उनकी तीव्रता के आधार पर विभिन्न नाम हैं।
    ये अधिक शक्तिशाली, खतरनाक वायुमण्डलीय तूफान होते हैं। ये
     चक्रवात गर्म सागरों में ग्रीष्म काल में उत्पन्न होते हैं। जबकि तापमान
     270से0 से अधिक होता है। भूमध्य रेखा के उत्तर तथा दक्षिण में
     कोरियालिस बल की तथा पृथ्वी की अक्षीय गति के कारण हवाओं की
     व्यवस्था चक्रीय हो जाती है। 
  7. बाढ़ प्राय: स्थलीय भाग के कई दिनों तक जलमग्न रहने से आती है।
     जब वर्षा का पानी नदी के किनारों से प्रवाहित होकर समीपी भाग को
     जलमग्न कर दे तो बाढ़ की स्थिति आती है।
    तटीय क्षेत्र में बाढ़
     वायुमण्डलीय तूफानों तथा उच्च ज्वार द्वारा जनित महालहरों के
     कारण आती है। क्योंकि इससे कई मीटर ऊंची लहरे तटीय भाग के 
    निचले क्षेत्र में प्रविष्ट कर जाती है। नगरीय क्षेत्र में बाढ़ जल निकासी
     की उचित व्यवस्था न होने के कारण आती है। 
  8. जब वार्षिक वर्षा सामान्य वर्षा से 75 प्रतिशत या उससे कम हो तो
     कृषि, पशुओं तथा जनसंख्या की जल की पर्याप्त मात्रा नहीं मिल
     पाती है। जल वर्षा कम होने के कारण मृदा में नमी की मात्रा कम हो
     जाती है जिससे फसल की न्यून पैदावार होती है तथा सतही और 
    भूमिगत जलस्तर गिर जाता है।

आपदा के प्रभाव (Effects of Disaster)

        संयुक्त राष्ट्र संघ (2015) की रिपोर्ट के अनुसार 2005 से 2014 के
 मध्य मौसम से सम्बन्धित आपदाओं में चक्रवात, बाढ़ और सूखा में बढ़ोत्तरी हुई
 है। रिपोर्ट के अनुसार प्रतिवर्ष औसत 335 आपदाएं आती हैं। वर्ष 1955 से
 2004 तक आपदाओं में निरन्तर वृद्धि हुई है। भारत, इन्डोनेशिया और
फिलीपाइन देशों का प्रतिशत सबसे अधिक आपदा प्रभावित देशों में रहा। 
इस रिपोर्ट के अनुसर 1994-2014 के मध्य से विभिन्न आपदाओं से 
440 करोड़ लोग प्रभावित हुए हैं। रिपोर्ट के अनुसार पिछले बीस वर्षों में
 विकासशील और अविकसित देश प्राकृतिक आपदा से अधिक प्रभावित रहे हैं।
 अविकसित देशों का प्रतिशत 33 प्रतिशत रहा है। लेकिन आपदा से 81
 प्रतिशत लोगों की मृत्यु इन्हीं देशों में हुई है।

        आपदाओं की प्रकृति, अवधि, तीव्रता अलग-अलग होती है। इसी 
कारण इन आपदाओं के प्रभाव तथा इनके परिणाम अलग होते हैं। आपदा के 
प्रभावों का मूल्यांकन विभिन्न आपदाओं की तीव्रता के आधार पर किया जा
 सकता है।

  1. कुछ आपदाएं अप्रत्याशित व त्वरित गति से आती है जैसे भूकम्प,
     ज्वालामुखी, चक्रवात तथा भूस्खलन आदि
    । इसके कारण अपार
    धन-जन की हानि होती है। इसका प्रभाव विस्तृत क्षेत्र पर पड़ता है। 
    भवनों एवं परिवहन तंत्रों का विनाश हो जाता है। बिजली एवं जल की
     आपूर्ति बाधित हो जाती है। पालतू जानवरों का विनाश हो जाता है।
     ये आपदाएं अधिक विनाशात्मक प्रभाव छोड़ती है। इसी कारण सामाजिक
     और आर्थिक ढांचे को अस्त-व्यस्त कर देती है। 
  2. कुछ आपदाएं अत्यन्त मंद गति से आती है और इनका प्रभाव दूरगामी
     पड़ता है। वर्षा की मात्रा कम होने के कारण सूखे की स्थिति पैदा हो
     सकती है।
    इसके कारण फसल विफलता तथा न्यून पैदावार होती है।
    यदि सूखे की समयावधि लम्बी हो निर्वनीकरण, मरूस्थलीकरण तथा
    मृदा अपरदन की समस्या पैदा हो सकती है। कृषि उत्पादन को 
    झटका लगता है तथा अन्न और जल के अभाव में अकाल की स्थिति
     आ सकती है तथा लोग भूखमरी, कुपोषण से ग्रस्त होकर अनेक
     बीमारियों की चपेट में आ सकते हैं। 
  3.         कुछ आपदाएं मानव जनित है। मानव की असावधानी, अज्ञानता, 
    लापरवाही, गलती या मानव निर्मित तंत्रों की विफलता के कारण
     होती है। जैसे दो राष्ट्रों के बीच युद्ध, गृह युद्ध, पर्यावरणीय असंतुलन,
    जनसंख्या विस्फोट तथा परमाणु युद्ध तथा औद्योगिक दुर्घटना आदि 
    है।
    युद्ध तथा गृह युद्ध के दौरान राष्ट्रीय सम्पत्ति को अधिक क्षति
     पहुंचती है जिसके कारण संसाधनों का अभाव हो जाता है तथा
     वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ने लगती हैं। देश में नागरिक आंदोलन,
     युद्ध तथा गृह युद्ध से हुआ विध्वंस प्राकृतिक प्रकोप के समान होता
    है। 
  4.         आपदा का त्वरित प्रभाव जनसंख्या का स्थानान्तरण है। बाढ़ और 
    भूकम्प के आने पर प्रभावित क्षेत्र के व्यक्ति अपना घर छोड़कर अन्यत्र
     पनाह लेते हैं। वहां पर उनको स्वच्छ जल, खाद्य आपूर्ति, शिक्षा तथा
     स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित होना पड़ता है। 
  5.        आपदाओं का स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अत्यधिक बाढ़ के
     बाद पानी जगह-जगह भर जाता है। इसमें मच्छर और बैक्टीरिया 
    पनपते हैं। जिसके कारण मानव अधिक बीमारियों से ग्रसित हो जाते
     हैं।
    परमाणु शक्ति संयंत्रों के रियेक्टरों के रेडिएशन का रिसाव मानव
     सहित सभी जीवों के लिए घातक तथा जानलेवा होता है। इसका
     प्रभाव विस्तृत क्षेत्र पर दीर्घ अवधि तक रहता है। नदियां, झीले तथा
    जलभण्डार रेडियो एक्टिव पदार्थों से संदूषित हो जाते हैं। 
  6.        प्राकृतिक आपदा के बाद अक्सर खाद्य पदार्थों की कमी हो जाती है।
     आपदा से फसल विफलता तथा न्यून पैदावार के कारण अनाज की 
    कीमतें बढ़ जाती हैं और लोगों में आर्थिक विपéता के कारण क्रय
    शक्ति की कमी हो जाती है। जिससे लोग भुखमरी के शिकार हो
    जाते है। पर्याप्त भोजन न मिलने के कारण लोग कुपोषण के शिकार
    हो जाते है और बच्चों का विकास लम्बी अवधि तक रूक जाता है। 
  7.        आपदा के बाद लोग परिजनों की मृत्यु तथा आर्थिक बदहाली के
     कारण ‘पोस्ट ट्रानमेटिक स्ट्रेस डिस्ऑडर’ नामक बीमारी से ग्रसित हो 
    जाते हैं। यह गम्भीर मनोवैज्ञानिक बीमारी है।
    इसमें व्यक्ति भय की 
    स्थिति से गुजरता है। इस रोग का अगर उपचार नहीं किया गया तो 
    व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक स्थिति हमेशा के लिए खराब हो जाएगी। 
  8.          आपदा का सर्वाधिक प्रभाव समाज के गरीब तबके के लोगों पर पड़ता
     है। इस दौरान उनकी जमापूंजी खत्म हो जाती है और वे अधिक
    निर्धन बन जाते हैं।

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